Tuesday, 7 December 2021

 

                         कोरोना काल में हमारा मीडिया

मार्च के अंतिम सप्ताह में हमारे परिवार में एक शिशु का आगमन हुआ. स्वाभाविक था कि हमें अस्पताल के कुछ चक्कर लगाने पड़े. अब यही कारण था या कुछ और हमें समझ नहीं आया लेकिन १३ अप्रैल को मेरे बेटे ( शिशु के पिता) को कोरोना हो गया. अगले तीन दिनों के अंदर घर के सभी सदस्य संक्रमित हो गये.

मुझे और मेरी पत्नी को वैक्सीन का एक इंजेक्शन लग चुका था इसलिए हम दोनों को अधिक परेशानी न हुई. चार या पाँच दिन बुखार रहा. फिर हमारी स्थिति में सुधार आने लगा.

लेकिन बेटे और बहु को बहुत कष्ट सहना पड़ा. अस्पताल में भर्ती होने की आवश्यकता तो नहीं आई. परन्तु बहुत मुसीबत झेलनी पड़ी. हमें सबसे अधिक चिंता शिशु की थी. कारण, मेरे बेटे के एक मित्र के परिवार के सब लोगों को जब कोरोना हुआ था तो उसका तीन माह का बच्चा भी इससे प्रभावित हुआ था.

इस कठिनाई के समय में सबसे अच्छी बात यह रही कि हम समाचार पत्रों और मीडिया से दूर रहे. समाचार पत्र तो लॉकडाउन के लगते ही मेरे बेटे ने लेना बंद कर दिया था. टीवी मेरे बेटे ने ले नहीं रखा. इस कारण हमें इस बात से पूरी तरह अनभिक्ष थे कि समाचार पत्रों में क्या लिखा जा रहा था और टीवी पर क्या दिखाया जा रहा था.

मई के अंत में जब हमारी गाड़ी पटरी पर लौटी तो जम्मू में माँ की तबियत बिगड़ने लगी. जून के शुरू होते ही हम जम्मू चले गये और वहाँ भी मीडिया से दूरी बनी रही. माँ कैलाशवासी हो गईं और मध्य-जुलाई में वापस लौटे.

यहाँ आकर पता चला कि कोरोना काल में मीडिया ने किस प्रकार की रिपोर्टिंग की थी. लौट कर जिससे भी हमारी बात हुई उसने यही कहा कि कठिनाई के समय में मीडिया से दूरी बना कर हमने बड़ी समझदारी का काम किया था.

जब देश में लोग एक भयावह स्थिति का सामना कर रहे थे, तब  मीडिया के प्रतिष्ठित महानुभाव लोगों का मनोबल तोड़ने का पूरा प्रयास कर रहा था. ऐसे-ऐसे दृश्य दिखाए गये कि भले-चंगे लोग भी सहम गये थे.

चूँकि मैंने स्वयं यह समाचार देखे या पढ़े नहीं इसलिय किसी निर्णय पर पहुँचना सरल नहीं है. लेकिन यू ट्यूब चैनलों पर कुछ विश्लेषकों को सुना उससे पता चलता है कि कोरोना काल में भी मीडिया राजनीति करने से नहीं चूका.  लेकिन यह आश्चर्यजनक नहीं है. इन लोगों की कौन फंडिंग कर रहा है वह जानना भी कठिन है. यह लोग किस के एजेंडा पर चल रहे हैं उसका अनुमान ही लगाया जा सकता है.

Friday, 3 December 2021

 

मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी

“तो आप का कहना है...किसी को सब्सिडी नहीं मिलनी चाहिए?” मुकन्दी लाल जी ने पूछा.

“प्रश्न यह नहीं है कि सब्सिडी मिलनी चाहिए या नहीं मिलनी चाहिए. प्रश्न यह है कि किसे मिलनी चाहिए और कब तक.” 

“अर्थात?”

“मुफ्त बिजली की ही बात करते हैं. मान लीजिये एक आदमी है जो एक महीने में पचास हज़ार रूपये कमाता है और उसका पड़ोसी पूरे साल में पचास हज़ार कमाता है. तो आपके विचार में क्या दोनों को एक समान बिजली पर सब्सिडी मिलनी चाहिए?”

“नहीं, बिलकुल नहीं.”

“अभी क्या हो रहा है. जिसकी आर्थिक स्थिति विषम नहीं है उसे भी सब्सिडी दी जा रही है. हर ओर मुफ्तखोरी चल रही है. नेता भी खुश लोग भी खुश.”

“क्यों?”

“राजनीति के लिए. मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी, मुफ्त साड़ियाँ, मुफ्त..मुफ्त...यह सब वोटरों को लुभाने के तरीकें हैं. नेता अपनी जेब से पैसे तो खर्च कर नहीं रहे...ऐसा नहीं है कि उनके पुरखे कुबेर का खज़ाना छोड़ गये थे जो यह लोगों में मुफ्त में बाँट रहे हैं.... आपका ही पैसा जिसे यह बाँट कर वोटरों को रिझाते हैं. टैक्स देते जाइए और मुफ्त बिजली लेते रहिये.”

“पर लोगों के आत्मसम्मान को चोट नहीं पहुँचती? खासकर वह जो सम्पन्न हैं?”

“इसका उत्तर तो आप स्वयं दे सकते हैं. क्यों, दे सकते हैं या नहीं?” मैंने घूर कर उन्हें देखते हुए कहा.

मुकन्दी लाल में मेरी बात सुन कर झेंप गये.

Thursday, 2 December 2021

 

            कौन भर रहा है आपका बिजली का बिल?

“इस माह का बिजली का बिल आज आ गया,” मुकंदी लाल जी चहकते हुए बोले.

“कितना है?”

“बिल तो 833.58 रूपये का है पर मुझे तो एक पैसा भी नहीं देना.”

“क्यों?”
“क्यों क्या अर्थ?
828.72 रुपये की सब्सिडी दी है हमारी कृपानिधान सरकार ने. बाकी रकम दस से कम है तो बस इसलिए जीरो बिल है. पर आप तो ऐसे कह रहे हैं कि आपको सब्सिडी नहीं मिलती?”

“भई, मैं भी तो यहीं रहता हूँ. मुझे भी मिलती है. पर आपने कभी सोचा है कि आपका बिजली का बिल कौन भर रहा है?”

“इससे मुझे क्या लेना-देना? यह काम सरकार का है. वह सब्सिडी दे रही है तो वह भर रही होगी.”

“हाँ, भर तो रही है पर जानते हैं कि इस सब्सिडी का पैसा जुटाने के लिए सरकार जो टैक्स लगाती है वो टैक्स गरीब से गरीब आदमी को भी देना पड़ता है. यह समझ लीजिये कि रास्ते में भीख मांगता भिखारी भी जब अपनी भीख के पैसे से कुछ खरीदता है तो वह भी टैक्स अदा करता है. उसी टैक्स से आपको सब्सिडी मिलती है.”

“अर्थात उसकी भीख का कुछ अंश मुझे मिल रहा है?’

“एक मायने में ऐसा ही है.”

“अगर सरकार ने पैसे उधार लिए हों तो?”

“वह रकम चुकाने के लिए भी टैक्स लगाना पड़ेगा, कभी न कभी.”

मुकन्दी लाल जी मेरी बात सुन कर खामोश हो गये. मैं समझ रहा था कि वह क्या सोच रहे थे. वह बहुत स्वाभिमानी व्यक्ति हैं पर आज उनके स्वाभिमान को थोड़ी ठेस लग गयी थी.

Monday, 29 November 2021

 

एक पुराना किस्सा

“आज एक पुराना किस्सा याद आ गया,” मुकन्दी लाल जी आज फिर बीते दिनों में पहुँच गये थे. “एक वकील के साथ मेरा पहली बार वास्ता पड़ा था. सुनेंगे?”

“अरे, आप सुनाये बिना रह पायेंगे क्या?” मैंने हंसते हुए कहा.

“हमारे एक कर्मचारी ने ट्रिब्यूनल में केस कर दिया कि बिना ट्रेड टेस्ट पास किये उसे प्रमोशन दी जाए. हम ने कहा कि नियमों के अनुसार ऐसा नहीं हो सकता. जो लोग ट्रेड टेस्ट पास करेंगे उन्हें ही प्रमोशन के लिए विचार किया जा सकता है. पर वह माना नहीं और उसने ट्रिब्यूनल में केस कर दिया. मैने डीडीजी के अनुमति लेकर फाइल कार्मिक विभाग को भेज दी और उन्होंने भी कहा कि ट्रेड टेस्ट पास करने के बाद ही किसी की प्रमोशन हो  सकती है. फाइल लेकर मैं सरकारी वकील से मिलने गया. उन्होंने भी कहा कि हमारा निर्णय सही है. उन्होंने आश्वासन दिया कि ट्रिब्यूनल एक ही सुनवाई में उक्त अर्जी खारिज कर देगा.”

“तो अवश्य ही ऐसा नहीं हुआ होगा?” मैंने चुटकी लेते हुए कहा.

“साहब, सुनवाई के दिन तो गज़ब हो गया. मैं भी ट्रिब्यूनल गया था, मेरा पहला अनुभव था. पूरा हॉल भरा हुआ था. हॉल के बीचोंबीच एक जंगला था. मुझ जैसे अधिकारी एक ओर खड़े या बैठे थे. दूसरी और ट्रिब्यूनल के मेम्बर्स के बैठने के लिए विशाल मंच थे और उनके सामने सब वकील थे. हमारे केस की बारी आई तो हमारे सरकारी वकील ने कहा कि विभाग ने कर्मचारी के केस को पुनर्विचार करने के निर्णय लिया है. उनकी बात सुन कर ट्रिब्यूनल ने अगली तारीख देकर सुनवाई खत्म कर दी. इस सब में तीस सेकंड भी नहीं लगे होंगे. मैं दंग रह गया. समझ ही नहीं आया कि क्या हुआ था, क्योंकि न हमने ऐसा कोई निर्णय लिया था और न ही उन्हें ऐसा ब्यान देने के लिए कहा था. मैं तुरंत भागा कि वकील साहब से कहूँ कि उन्होंने ने ऐसा बयान क्यों दिया था. जब तक भीड़ को चीरते हुए मैं बाहर आया वकील साहब पहले दरवाज़े से बाहर निकल, किसी दूसरी कोर्ट में जा चुके थे.”

“आश्चर्य है!”

“तब मुझे भी आश्चर्य हुआ था. गुस्सा भी आया था. मैंने आकर अपने डीडीजी को यह बताई और कहा कि हमें विधि मंत्रालय को शिकायत करनी चाहिए.”

“फिर?”

“वह अनुभवी अधिकारी थे. मुस्कराए. बोले, अभी पाँच साल की ही नौकरी है तुम्हारी. आज पहली बार कोर्ट या ट्रिब्यूनल गए थे. इसलिए उत्तेजित हो रहे हो. धीरे-धीरे समझ आएगी.”

“शायद ठीक ही कहा था उन्होंने,” मैंने टिपण्णी क्यों की वकीलों के साथ मेरा अपना अनुभव भी कोई ख़ास अच्छा न था.

“बाद में कई बार वकीलों से वास्ता पड़ा. और धीरे-धीर समझ आ ही गया कि.......”

…..लोग क्यों कामना करते हैं कि कभी अदालत न जाना पड़े, कभी वकीलों के मुँह न लगना पड़े,” मैंने सिर हिला कर बीच में टोक कर कहा.

उपलेख: यह किस्सा सत्य घटना पर आधारित है. आगे चल कर वकील साहब कुछ समय के लिए भारत सरकार के एएसजी भी बने.        

Thursday, 25 November 2021

 क्या यह लोग हिंदू विरोधी नहीं हैं?

किसान कानूनों के वापस लेने के परिपेक्षय में नागरिकता कानून को लेकर लेफ्ट-लिबरल और कुछ नेता सक्रिय हो रहे हैं. इनके बयानों को सुन कर प्रश्न उठता है कि क्या यह लोग हिंदू विरोधी नहीं हैं?

नागरिकता कानून के अंतर्गत उन लोगों को नागरिकता देने का प्रावधान है जो बँगला देश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में अल्पसंख्यक हैं और जो धार्मिक उत्पीड़न के कारण 2014 से पहले भारत आ गये थे.

पाकिस्तान और अफगानिस्तान में तो हिंदुओं की संख्या अब न के बराबर ही है. बँगला देश में भी हिंदुओं की संख्या बहुत घट गई है. इसलिए स्वाभाविक है कि धार्मिक उत्पीड़न के चलते, इन देशों से भारत में आये लोगों में सबसे बड़ी संख्या हिन्दुओं की है.

इस कानून के द्वारा भारत के किसी नागरिक की नागरिकता खत्म करने का कोई प्रावधान नहीं है और न ही किसी का कोई अधिकार छीना जा सकता है. इसलिए जब लेफ्ट-लिबरल वगेरह इस कानून को वापस लेने की मांग करते हैं तो एक तरह से वह मांग कर रहे हैं कि भारत से आये हिन्दुओं को भारत की नागरिकता न दी जाए.

विचारणीय है कि जब पिछले दिनों बँगला देश में हिन्दुओं पर फिर से हमले हुए थे तब इन लेफ्ट-लिबरल या इन नेताओं  ने इसके विरोध में एक शब्द भी न कहा था. (वेस्ट बंगाल के हिन्दुओं की चुपी तो चिंता का विषय होनी चाहिए). अगर ऐसे हमले यू पी या गुजरात में एक वर्ग विशेष पर हुए होते तो नश्चय ही यह लेफ्ट लिबरल दिल्ली से लेकर न्यू यॉर्क तक छाती पीट कर रो रहे होते.

तो क्या इस व्यवहार को देखते हुए, यह अनुमान लगाना गलत होगा की यह लोग हिंदू विरोधी हैं और हिंदू विरोध में ही नागरिकता कानून को वापस लेने की मांग कर रहे हैं?

उपलेख: क्या कश्मीर से मार कर भगाए गये हिन्दुओं के समर्थन में जेएनयू में कभी कोई प्रदर्शन हुआ था? क्या लेफ्ट लिबरल लोग मोमबत्तियां लेकर जंतर-मंतर या कहीं ओर कभी इकट्ठे हुए थे?  

Wednesday, 24 November 2021

 

क्यों?

“यह अचानक सभी लोग हिन्दुओं के विरुद्ध ऐसी अपमानजनक बातें क्यों कहने लगे हैं?” मुकन्दी लाल जी ने बड़े दुःखी भाव से पूछा.

“भाई साहब, मैंने पहले भी आप से कहा था, राजनीति में अचानक कुछ नहीं होता.  यह सब भी अचानक नहीं हो रहा. इस देश में कुछ लोग हैं जिन्हें हिन्दुओं से कुछ अधिक ही प्रेम है. बस अपना प्रेम व्यक्त करने का ढंग थोड़ा निराला है.”

“कोई कारण तो होगा जो वो ऐसा कर रहे हैं.”

“अब किसी के मन में झाँक कर तो देख नहीं सकते, हम तो अनुमान ही लगा सकते हैं.”

“क्या अनुमान है आपका?”

“हो सकता है उन्हें लगता हो कि अब सत्ता पाने का उनके पास एक ही उपाय है. देखा जाए तो भाजपा कांग्रेस बनती जा रही है, ऐसे में कांग्रेस के पास क्या विकल्प है? भाजपा तो बन नहीं सकती, तो एक ही रास्ता बचता है, मुस्लिम लीग बनना.”   

“मुझे तो लगता है कि ऐसा करने के लिए उन्हें कोई मजबूर कर रहा.”

“कौन मजबूर कर सकता है?” मैंने पूछा.

“कोई भी...चीन कर सकता है...चर्च कर सकती है....जिहादी कर सकते हैं, याद नहीं मुंबई हमले के लिए एक नेता ने आरएसएस को ज़िम्मेवार ठहराया था.”

“चीन?”

“चीन की पार्टी के साथ एग्रीमेंट जैसा कुछ नहीं किया था क्या?”

“नहीं-नहीं, मुझे लगता यह कारण नहीं हो सकते हैं, शायद इन लोगों की सोच ही विकृत है. शायद यह लोग सच में सनातन धर्म से घृणा करते हैं.”

“सनातन धर्म से या हिन्दुओं से? बीच-बीच में यह लोग मंदिर-मंदिर भी जाते हैं.”

“मंदिरों में घूमने से क्या होता है.मन में क्या है वह महत्वपूर्ण है.”

“अच्छा तो यह होता कि ईमानदारी से बता देते कि.......”

मुकन्दी लाल जी को मैंने बीच में ही टोका, “ईमानदारी, अब आप अन्याय कर रहे हैं राजनेताओं के साथ.”

मेरी बात सुन कर वह ज़ोर से हंस दिए.    

Monday, 22 November 2021

                                                क्यों आई ऐसी स्तिथि?

कुछ दिन पहले तेलगु देशम पार्टी के अध्यक्ष श्री चन्द्र बाबू नायडू विधान सभा से बाहर आये. उन्होंने एक प्रेस कांफ्रेंस बुलाई और लोगों से बात करते-करते फूट-फूट कर रोने लगे.

उनके जैसे वरिष्ठ राजनेता का इस प्रकार अश्रुपूर्ण हो जाना सब के लिए चिंता का विषय होना चाहिए पर लगता नहीं है कि देश के अधिकाँश राजनेताओं ने इस ओर कोई ध्यान भी दिया है.

नायडू जी का कहना था कि विधान सभा के कुछ सदस्यों के व्यवहार ने उन्हें बहुत आहत किया था, क्योंकि उनकी पत्नी को लेकर अपशब्द कहे गये थे. उनका यह भी कहना था कि उनके साथ तो अभद्र व्यवहार लंबे समय से हो रहा था.

प्रश्न यह है कि ऐसी स्तिथि क्यों आई और इसके लिए उत्तरदायी कौन है.

मेरा मानना है कि इस स्थिति के लिए राजनेता स्वयं उत्तरदायी हैं. वह किसी और को दोष नहीं दे सकते. कम से कम जनता को दोषी नहीं ठहरा सकते.

अगर राजनितिक पार्टियाँ परिवारों की बंधक बन कर रह गई हैं तो राजनेताओं का दोष है. अगर वह अपराधिक छवि के लोगों को चुनाव में उतारती हैं तो उसका परिणाम भी उन्हें ही भुगतना पड़ेगा. अगर परिवार को, जाति को, धर्म को, क्षेत्र को, भाषा को देश से अधिक महत्व दिया जाता है तो वैसी ही राजनीति के लिए उन्हें तैयार रहना होगा.

सच तो यह है कि राजनीति में कई लोग ऐसे हैं जिन्हें राजनीति से कोसों दूर होना चाहिए था. परन्तु आज की राजनीति में ऐसे लोग खूब फलफूल रहे हैं क्योंकि आज की राजनीति का उद्देश्य किसी भी तरह सत्ता पाने और भोगने का है.

जिस प्रकार मर्यादाएं भंग हो रही हैं उसे देखते हुए हमें रत्ती भर भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए अगर निकट भविष्य में ऐसा व्यवहार अन्य विधान सभाओं के सदस्यों और सांसदों के साथ होने लगे.