Sunday, 9 August 2026

 

हर दिन पांच सौ लोगों की मौत

मैं एक एनजीओ के साथ जुड़ा हूँ. हम सब कुछ बच्चों को अलग-अलग पार्कों में पढ़ाते हैं. सात दिन पहले एक दुखद समाचार मिला कि सेक्टर 2 की पाठशाला के एक लड़के का, जो बारहवीं कक्षा में पढ़ता था, एक सड़क दुर्घटना में असामयिक निधन हो गया था. दो बहनें का वह अकेला भाई था. स्वाभाविक है कि माँ-बाप पर दुखों का पहाड़ आ गिरा था.

वह और उसका दोस्त, सुबह-सुबह स्कूटर पर, बिना हेलमेट पहने, निकल गए थे. एक जगह दुर्घटना हो गई. एक लड़के की घटनास्थल पर ही मृत्यु हो गई, दूसरा गंभीर रुप से घायल हो गया.

इस देश में यह एक बहुत ही मामूली घटना थी. इसे लेकर न कोई चर्चा हुई, न कोई विरोध प्रदर्शन.

एक साल पहले कश्मीर में 28 लोगों की आतंकवादियों ने नृशंस हत्या कर दी थी. इस दुखद और अमानवीय घटना ने सारे देश को हिला कर रख दिया था. हम सब ने देखा था कि किस प्रकार प्रतिक्रिया हुई थी. सरकार ने भी कठोर कार्यवाही की थी.

कश्मीर की घटना की तुलना सड़क दुर्घटनाओं से बिलकुल नहीं की जा सकती, पर फिर भी मैं आप लोगों से पूछना चाहता हूँ कि क्या आपको पता है कि कितने लोग हर दिन सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं?

सरकार की पिछली रिपोर्ट के अनुसार 2025 में हर दिन 502 लोग सड़क दुर्घटनाओं में मारे गए. पता नहीं कि इस रिपोर्ट में यह सत्य उजागर हुआ है या नहीं, पर हम सब जानते हैं कि सड़कों पर अधिकांश दुर्घटनाएं वाहन चालकों की गलती के कारण होती हैं. अर्थात हम वाहन-चालक ही अधिकांश मौतों के लिए ज़िम्मेवार हैं.

यह एक भयभीत करने वाली स्थिति है. पर समाज में इस गंभीर समस्या को लेकर न कोई चर्चा होती है, न समाज इस को लेकर चिंतित है और न ही कहीं कोई आक्रोश दिखाई देता है.

सड़क दुर्घटनाओं को लेकर समाज में इतनी उदासीनता क्यों है? लोगों में इतनी बेपरवाही क्यों है?

आतंकवाद की घटना को लेकर हमारा आक्रोश वाजिब है. सरकार को उत्तरदायी ठहराना भी उचित है. इस प्रतिक्रिया का परिणाम भी देखने के मिलता है.

लेकिन हर दिन सड़कों पर हो रही 500 मौतों के लिए हम कोई प्रतिक्रिया नहीं देते. हम बिलकुल बेपरवाह रहते हैं. कारण? अगर हम प्रतिक्रिया दें तो हमें स्वीकार करना पड़ेगा कि अधिकांश घटनाओं के लिए हम स्वयं ही दोषी हैं.

लेकिन हम तो अपने को दोषी मानते ही नहीं. इस झूठ को सच मान कर हम मज़े से सड़कों पर, आतंकियों की तरह, गाड़ियां दौड़ाते रहते हैं.

हमारी चुप्पी इस सत्य को झुठला नहीं सकती कि वाहन चलाते समय जो लोग ट्रैफिक नियमों का पालन नहीं करते वह सब इन घटनाओं के लिए और अधिकांश मौतों के लिए पूरी तरह ज़िम्मेवार हैं. अगर कोई ट्रैफिक लाइट की अनदेखी करता है या गलत साइड पर या तेज़ गति से गाड़ी चलाता है या अन्य नियमों का उल्लंघन करता है, तो वह स्वयं को निर्दोष कैसे मान सकता है?

हम लोग तो रास्ते पर किसी वाहन को टक्कर मार कर यह देखने के लिए रुकते भी नहीं कि किसी को चोट तो नहीं लगी है.  ऐसे आगे बढ़ जाते हैं कि जैसे किसी मनुष्य को नहीं, किसी कीड़े को मारा हो.

हमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए अगर दो-चार सालों में ही सड़क दुर्घटनाओं में मरने वालों की संख्या बढ़ कर एक हज़ार हो जाए.

हम तब भी इतने ही उदासीन और बेपरवाह होंगे.

हम इस स्थिति को एक दिन में ही बदल सकते हैं, बस हर एक को निश्चय करना होगा कि सड़क पर वह सभ्य लोगों की तरह गाड़ी चलाएगा, आतंकियों की तरह नहीं.