Tuesday, 18 August 2026

 

“मैं गर्व से कहता हूँ कि मैं दिमागी नक्सल हूँ”

एक रिपोर्ट के अनुसार 1970s से लेकर 2014 तक लगभग 92000 लोगों को अलग-अलग प्रकार के आतंकवाद के कारण अपनी जान गंवानी पड़ी थी.

एक ओर यह समस्या इतनी डरावनी थी तो दूसरी ओर, 2014 से पहले भारत सरकार ने आतंकवाद के खिलाफ कभी भी कोई ठोस कार्यवाही नहीं की थी. यहाँ तक कि जब मुंबई में पाकिस्तान से आए आतंकवादियों ने हमला किया था तब भी भारत सरकार ने पाकिस्तान के खिलाफ कोई ऐक्शन न लिया था, उल्टा आतंकवादियों को दोष से बचाने के लिए हिंदू-आतंकवाद का झूठा नरेटिव चलाया गया था.

नक्सलवादियों के सामने तो सरकार ने लगभग घुटने ही टेक दिए थे. परिणाम 2014 तक 10 राज्यों के 126 ज़िले नक्सल आतंकवाद कि चपेट में आ गए थे. इन आतंकवादियों के समर्थक अर्बन नक्सल कई संस्थाओं में स्थापित हो गए थे.

एक साधारण आदमी के लिए यह समझना कठिन था कि सरकार इन आतंकवादियों के खिलाफ कोई ठोस कार्यवाही क्यों नहीं कर रही थी.

आज इस प्रश्न का उत्तर एक कांग्रेसी ने स्वयं दिया है. उसका ब्यान आया है, “मैं गर्व से कहता हूँ कि मैं दिमागी नक्सल हूँ.”

वैसे अपनी समझ से वह नेता अपने को प्रतिष्ठा का एक मैडल दे रहे हैं, पर उनके कथन से कई बातें स्पष्ट हो जाती हैं.

2014 के बाद, अचानक कुछ बुद्धिजीवी अपने अवार्ड लौटाने लगते हैं.

दिल्ली में एक यूनिवर्सिटी में बार-बार नारे लगते हैं:

अफज़ल हम शर्मिंदा हैं.....

भारत तेरे टुकड़े होंगे....

हम क्या चाहते आज़ादी...

सीएए विरोध में कुछ नेताओं के सामने आज़ादी का नारे लगते हैं, प्रधान मंत्री की मृत्यु की कामना की जाती है, यह सब क्या ऐसे ही होने लगा था? या यह एक रणनीति के अनुसार हो रहा था? क्या सत्ता में बैठे लोगों की अनुमति के बिना यह सब हो सकता था?

कश्मीर फाइल्स का डायलॉग कि ‘सरकार किसी की भी हो, सिस्टम तो हमारा है’, एक डरावना सच है जिसकी पुष्टि वह सब लोग आज कर रहे हैं जो (गर्व से) कह रहे हैं कि वह दिमागी नक्सल हैं.

देश-विरोध में हज़ारों लोग एकजुट हैं इसका थोड़ा-बहुत आभास तो आम लोगों को पहले ही था. पर अब यह लोग सामने आकर चुनौती दे रहे हैं. यह एक खतरे की घंटी है.

हमें यह भी समझना होगी कि अगर दस आदमी अपनी सच्चाई बता रहे हैं तो शायद सिस्टम में बैठे दस आदमी अभी भी अपनी सच्ची छिपा रहे होंगे.

अब सरकार क्या कार्यवाही करती है, वह महत्वपूर्ण है. पर उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि वोटरों की प्रतिक्रिया क्या होगी? अब बॉल वोटरों के पाले में है.

निकट भविष्य में आने वाले चुनाव तय करेंगे कि भारत सुरक्षित रहेगा या नहीं. वोटर ही अपनी समझ से (या नासमझी से) अपनी नियति तय करेंगे.     

Thursday, 13 August 2026

 

संसद में हंगामा

कोई भी चालाक सरकार यह नहीं चाहेगी कि संसद की कार्यवाही हर समय नियमों के अनुसार, शांतिपूर्ण ढंग से चले.

जब संसद में हंगामा होता है तो कई बार इस हंगामे के बीच सरकार, बिना किसी चर्चा के, आवश्यक बिल पास करवा लेती है. ऐसा इस बार भी हुआ. अगर चर्चा होती तो विपक्ष प्रस्तावित कानूनों की खामियां लोगों के सामने ला सकता था. प्रस्तावों में सुधार लाने को सुझाव दे सकता था. सरकार का अगर कोई अप्रत्यक्ष एजेंडा है तो विपक्ष उस एजेंडा को उजागर कर सकता था, लोगों को सतर्क कर सकता था.

हंगामे के कारण, सरकार अकसर जवाबदेही से पूरी तरह बच जाती है. अगर संसद सुचारू रूप से चले तो विपक्ष सरकार की नीतियों की, कार्यशैली की, निर्णयों को, अनिर्णयों की आलोचना कर सकता है, सरकार के विफलताओं को लोगों के सामने ला सकता है.

इसलिए संसद में विपक्ष के हंगामे से सरकार कभी परेशान नहीं होती. इस बार भी नहीं हुई.

प्रश्न उठता है कि विपक्ष संसद की कार्यवाही को क्यों बाधित करता है?

इसके कई कारण हैं.

प्रतीत होता है कि विपक्ष को लोगों की समस्याओं से अब अधिक सरोकार नहीं है. मंगाई हो या बेराज़गारी, भीतरी सुरक्षा हो या बाहरी, युवाओं के मुद्दे हों या महिलाओं के, किसानों की समस्याएं हों या कामगारों की, विपक्ष इन सब मुद्दों से अब कट चुका है. सिर्फ दिखावे के लिए मुद्दे उठाए जाते हैं और दो-चार दिन बाद भुला दिया जाता है.

अगर आप ने संसद की कार्यवाही देखी है तो आप ने ज़रूर देखा होगा कि गंभीर मुद्दों पर चर्चा के समय भी सौ से अधिक सदस्य लोकसभा में दिखाई नहीं देते. राज्य सभा में यह संख्या पचास-साठ ही होती है.

एक मुद्दे पर सार्थक चर्चा करना के लिए बहुत मेहनत करने की ज़रूरत होती है, ऐसी मेहनत करना हर किसी के लिए संभव नहीं है. हंगामा तो कोई भी कर सकता है.

और आश्चर्य है कि सरकार की चाल में फंस कर विपक्ष संसद की कार्यवाही को बाधित करता है और इसे अपनी जीत मानता है. विपक्ष के नेताओं को समझ ही नहीं आता कि सरकार की लगाम कसने का मौका उन्होंने फिर एक बार खो दिया है.

 

 

 

 

Sunday, 9 August 2026

 

हर दिन पांच सौ लोगों की मौत

मैं एक एनजीओ के साथ जुड़ा हूँ. हम सब कुछ बच्चों को अलग-अलग पार्कों में पढ़ाते हैं. सात दिन पहले एक दुखद समाचार मिला कि सेक्टर 2 की पाठशाला के एक लड़के का, जो बारहवीं कक्षा में पढ़ता था, एक सड़क दुर्घटना में असामयिक निधन हो गया था. दो बहनें का वह अकेला भाई था. स्वाभाविक है कि माँ-बाप पर दुखों का पहाड़ आ गिरा था.

वह और उसका दोस्त, सुबह-सुबह स्कूटर पर, बिना हेलमेट पहने, निकल गए थे. एक जगह दुर्घटना हो गई. एक लड़के की घटनास्थल पर ही मृत्यु हो गई, दूसरा गंभीर रुप से घायल हो गया.

इस देश में यह एक बहुत ही मामूली घटना थी. इसे लेकर न कोई चर्चा हुई, न कोई विरोध प्रदर्शन.

एक साल पहले कश्मीर में 28 लोगों की आतंकवादियों ने नृशंस हत्या कर दी थी. इस दुखद और अमानवीय घटना ने सारे देश को हिला कर रख दिया था. हम सब ने देखा था कि किस प्रकार प्रतिक्रिया हुई थी. सरकार ने भी कठोर कार्यवाही की थी.

कश्मीर की घटना की तुलना सड़क दुर्घटनाओं से बिलकुल नहीं की जा सकती, पर फिर भी मैं आप लोगों से पूछना चाहता हूँ कि क्या आपको पता है कि कितने लोग हर दिन सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं?

सरकार की पिछली रिपोर्ट के अनुसार 2025 में हर दिन 502 लोग सड़क दुर्घटनाओं में मारे गए. पता नहीं कि इस रिपोर्ट में यह सत्य उजागर हुआ है या नहीं, पर हम सब जानते हैं कि सड़कों पर अधिकांश दुर्घटनाएं वाहन चालकों की गलती के कारण होती हैं. अर्थात हम वाहन-चालक ही अधिकांश मौतों के लिए ज़िम्मेवार हैं.

यह एक भयभीत करने वाली स्थिति है. पर समाज में इस गंभीर समस्या को लेकर न कोई चर्चा होती है, न समाज इस को लेकर चिंतित है और न ही कहीं कोई आक्रोश दिखाई देता है.

सड़क दुर्घटनाओं को लेकर समाज में इतनी उदासीनता क्यों है? लोगों में इतनी बेपरवाही क्यों है?

आतंकवाद की घटना को लेकर हमारा आक्रोश वाजिब है. सरकार को उत्तरदायी ठहराना भी उचित है. इस प्रतिक्रिया का परिणाम भी देखने के मिलता है.

लेकिन हर दिन सड़कों पर हो रही 500 मौतों के लिए हम कोई प्रतिक्रिया नहीं देते. हम बिलकुल बेपरवाह रहते हैं. कारण? अगर हम प्रतिक्रिया दें तो हमें स्वीकार करना पड़ेगा कि अधिकांश घटनाओं के लिए हम स्वयं ही दोषी हैं.

लेकिन हम तो अपने को दोषी मानते ही नहीं. इस झूठ को सच मान कर हम मज़े से सड़कों पर, आतंकियों की तरह, गाड़ियां दौड़ाते रहते हैं.

हमारी चुप्पी इस सत्य को झुठला नहीं सकती कि वाहन चलाते समय जो लोग ट्रैफिक नियमों का पालन नहीं करते वह सब इन घटनाओं के लिए और अधिकांश मौतों के लिए पूरी तरह ज़िम्मेवार हैं. अगर कोई ट्रैफिक लाइट की अनदेखी करता है या गलत साइड पर या तेज़ गति से गाड़ी चलाता है या अन्य नियमों का उल्लंघन करता है, तो वह स्वयं को निर्दोष कैसे मान सकता है?

हम लोग तो रास्ते पर किसी वाहन को टक्कर मार कर यह देखने के लिए रुकते भी नहीं कि किसी को चोट तो नहीं लगी है.  ऐसे आगे बढ़ जाते हैं कि जैसे किसी मनुष्य को नहीं, किसी कीड़े को मारा हो.

हमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए अगर दो-चार सालों में ही सड़क दुर्घटनाओं में मरने वालों की संख्या बढ़ कर एक हज़ार हो जाए.

हम तब भी इतने ही उदासीन और बेपरवाह होंगे.

हम इस स्थिति को एक दिन में ही बदल सकते हैं, बस हर एक को निश्चय करना होगा कि सड़क पर वह सभ्य लोगों की तरह गाड़ी चलाएगा, आतंकियों की तरह नहीं.