Thursday, 13 August 2026

 

संसद में हंगामा

कोई भी चालाक सरकार यह नहीं चाहेगी कि संसद की कार्यवाही हर समय नियमों के अनुसार, शांतिपूर्ण ढंग से चले.

जब संसद में हंगामा होता है तो कई बार इस हंगामे के बीच सरकार, बिना किसी चर्चा के, आवश्यक बिल पास करवा लेती है. ऐसा इस बार भी हुआ. अगर चर्चा होती तो विपक्ष प्रस्तावित कानूनों की खामियां लोगों के सामने ला सकता था. प्रस्तावों में सुधार लाने को सुझाव दे सकता था. सरकार का अगर कोई अप्रत्यक्ष एजेंडा है तो विपक्ष उस एजेंडा को उजागर कर सकता था, लोगों को सतर्क कर सकता था.

हंगामे के कारण, सरकार अकसर जवाबदेही से पूरी तरह बच जाती है. अगर संसद सुचारू रूप से चले तो विपक्ष सरकार की नीतियों की, कार्यशैली की, निर्णयों को, अनिर्णयों की आलोचना कर सकता है, सरकार के विफलताओं को लोगों के सामने ला सकता है.

इसलिए संसद में विपक्ष के हंगामे से सरकार कभी परेशान नहीं होती. इस बार भी नहीं हुई.

प्रश्न उठता है कि विपक्ष संसद की कार्यवाही को क्यों बाधित करता है?

इसके कई कारण हैं.

प्रतीत होता है कि विपक्ष को लोगों की समस्याओं से अब अधिक सरोकार नहीं है. मंगाई हो या बेराज़गारी, भीतरी सुरक्षा हो या बाहरी, युवाओं के मुद्दे हों या महिलाओं के, किसानों की समस्याएं हों या कामगारों की, विपक्ष इन सब मुद्दों से अब कट चुका है. सिर्फ दिखावे के लिए मुद्दे उठाए जाते हैं और दो-चार दिन बाद भुला दिया जाता है.

अगर आप ने संसद की कार्यवाही देखी है तो आप ने ज़रूर देखा होगा कि गंभीर मुद्दों पर चर्चा के समय भी सौ से अधिक सदस्य लोकसभा में दिखाई नहीं देते. राज्य सभा में यह संख्या पचास-साठ ही होती है.

एक मुद्दे पर सार्थक चर्चा करना के लिए बहुत मेहनत करने की ज़रूरत होती है, ऐसी मेहनत करना हर किसी के लिए संभव नहीं है. हंगामा तो कोई भी कर सकता है.

और आश्चर्य है कि सरकार की चाल में फंस कर विपक्ष संसद की कार्यवाही को बाधित करता है और इसे अपनी जीत मानता है. विपक्ष के नेताओं को समझ ही नहीं आता कि सरकार की लगाम कसने का मौका उन्होंने फिर एक बार खो दिया है.

 

 

 

 

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