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Sunday, 5 June 2016

अनमोल हीरा
कोई न जानता था कि वह एक लुटेरा था. उसके विवाह को बीस वर्ष हो गए थे परंतु उसकी पत्नी भी आज तक इस सत्य को न जान पायी थी.
वह जब भी किसी को लूटता था तब सारा काम बहुत चालाकी के साथ करता था. सोच-समझ कर और एक योजना बना कर ही किसी को लूटने जाता था और पीछे कोई सुराग न छोड़ता था. पुलिस को कभी भी कोई भी ऐसा सुराग न मिला जो उसे कानून के शिकंजे में फंसा देता.
वह हमेशा उन अमीर लोगों को लूटता था जो अपनी सुरक्षा को लेकर लापरवाह होते थे. उसने करोड़ों रूपए की सम्पत्ति इकट्ठी कर ली थी; अब लूटपाट करने की कोई आवश्यकता न थी. परन्तु अपने को रोक पाना उसके लिए असम्भव सा हो गया था. भीतर एक उन्माद सा उठता था और वह किसी लूट की योजना में व्यस्त हो जाता था.
इस बार उसने राजवंश परिवार को निशाना बनाने का निश्चय किया था. मन ही मन उसने एक प्रण भी ले लिया था. उसने अपने-आप को वचन दिया था कि राजवंश परिवार को लूटने के बाद वह कभी कोई लूटपाट न करेगा; यह उसके जीवन की अंतिम लूट होगी.
वह पूरी छानबीन कर चुका था. राजवंश परिवार में पाँच सदस्य थे, राज राजवंश, उसकी बूढ़ी माँ, पत्नी और दो बेटियाँ. परिवार का सम्बंध किसी राज घराने से था और ऐसा समझा जाता था कि विरासत में राजवंश परिवार को बहुमूल्य हीरे और जवाहरात भी मिले थे. 
उसने राजवंश हाउस की कई दिनों तक निगरानी की. जब वह पूरी तरह आश्वस्त हो गया कि उस परिवार को लूटना बहुत सरल है तब वह उचित अवसर की प्रतीक्षा करने लगा.
जिस दिन राजवंश परिवार छुट्टियां मनाने विदेश गया उसी रात उसने उन्हें लूटने की बात सोची. रात लगभग दो बजे वह घर के भीतर घुसा. चौकीदार ऊंघ रहा था. उसे उसने बेहोशी की दवा सुंघा दी. दो कुत्ते थे, उन्हें भी दवा मिला मांस खिला दिया. भीतर सभी नौकर गहरी नींद में थे.
तिजौरी राजवंश की माँ के कमरे में थी. वह जाग रही थी पर बीमार थी. उसने बुढ़िया की रत्तीभर भी परवाह न की और अपने काम में जुट गया. तिजौरी खोलने में वह खूब माहिर था. तिजौरी आसानी से खुल गई. तिजौरी में रखे हीरे, जवाहरात देख कर वह दंग रह गया.
‘नीले हीरे को हाथ भी न लगाना. वह एक स्टील के डिब्बे में है. बहुत ही अशुभ वह हीरा, तुम ने अगर उसे छू भी लिया तो जीवन पर पछताओगे.’ वह चौंक गया. यह बात राज राजवंश की माँ ने कही थी, आश्चर्य की बात यह थी कि उसकी आवाज़ बहुत ही कठोर और तीख़ी थी.
उसने कोई उत्तर न दिया. एक उत्सुकता उसके मन में जागी. वह झटपट स्टील के डिब्बे को ढूँढने लगा. डिब्बा मिलते ही उसने उसे खोला. भीतर एक अनमोल हीरा था, इतना बड़ा हीरा उसने आज तक न देखा था. हीरा हाथ में लेकर परखने लगा. हीरों की उसे अच्छी परख थी. यह एक अनोखा, अमूल्य हीरा था.
हीरे को अपनी जेब में रखते हुए उसने कहा, ‘अम्मा, आपने मुझे बहकाने का अच्छा प्रयास किया. पर मैं आपका धन्यवाद करता हूँ, आप न बताती तो शायद मुझे इसका पता ही न चलता, शायद मैं इसे ढूंढॅ ही न पाता.’
उसने तिजौरी में रखे बाकी सामान को वहीं छोड़ दिया. वह जानता था कि जो हीरा उसकी जेब में था वह अन्य सभी हीरे-जवाहरातों से अधिक मूल्यवान था.
तिजौरी बंद कर वह चल दिया. दरवाज़े के निकट पहुँच वह ठिठक कर रुक गया. अचानक एक अनजाना भय उसे डराने लगा. वह लौट कर भीतर आ गया. उसने बूढ़ी औरत की ओर देखा. वह एकटक घूर कर उसे देख रही थी.
‘तुम डर रहे हो? तुम्हें भय है कि मैं तुम्हें पहचान सकती हूँ? पुलिस को तुम्हारा हुलिया बता सकती हूँ?’ इतना कह वह जोर से हंसीं. उसकी हंसीं ने उसे डरा दिया.
अनचाहे उसके हाथ उठे और उसने उस औरत का गला दबा दिया. वह छटपटाती रही पर उसने तब तक उसका गला दबाये रखा जब तक कि उसकी मृत्यु न हो गयी.
घर लौट कर ही उसे अहसास हुआ कि वह बहुत बड़ी भूल कर बैठा था. उसने सैंकड़ों बार लूटपाट की थी पर आज तक कभी किसी को घायल न किया था. हिंसा से उसे सख्त घृणा थी. उसने तो कभी किसी को खरोंच तक न मारी थी. आज वह एक हत्या कर बैठा था, वह भी एक असहाय, बूढ़ी औरत की. वह जानता था कि ऐसा जघन्य अपराध करने की कोई आवश्यकता ही नहीं थी.   
अब अपने को कोसने के अतिरिक्त वह कुछ न कर सकता था. अपने कपड़े बदले बिना ही वह बिस्तर पर निढाल सा गिर गया.
अगली सुबह वह बहुत देर तक सोया रहा. पत्नी ने उसे जगाने का प्रयास किया पर वह उठ ही न पाया.
दुपहर बाद ही वह उठा. पत्नी उसके लिए कॉफ़ी लेकर आई और बड़ी उतेजना से बोली, ‘कल रात राजवंश हाउस में चोरी हुई. सभी न्यूज़ चैनलों पर यह समाचार छाया हुआ है. चोर क्या कुछ ले गए यह अभी पता नहीं चला, तिजौरी खाली मिली. चोर राजवंश की माँ की हत्या भी कर गए. बेचारी बीमार थी, अपाहिज थी, अंधी थी, बिल्कुल देख नहीं सकती थी. पर आश्चर्य की बात यह है कि उसकी मुट्ठी में एक अनमोल हीरा था, नीले रंग का. चोर वह हीरा नहीं ले जा सके.’
उसने धीमे से अपनी जेब को टटोला. जेब खाली थी, जेब में हीरा नहीं था.
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©आइ बी अरोड़ा 

Thursday, 2 June 2016

एक निर्दोष पक्षी की ह्त्या  (अंतिम भाग)
 ‘................’ सुधा और सुबोध को कुछ समझ न आया. दोनों ने एक-दूसरे की ओर देखा. दोनों ओर सिर्फ प्रश्न थे. कोई कुछ कह न पाया. विचारों को शब्दों में ढालना शायद वह भूल गए थे.
‘हत्यारा पकड़ा गया है.’ कुछ और कठोर शब्दों ने उन्हें घेर लिया.
‘हत्यारा?’ सुबोध को अपनी वाणी निर्जीव व अपरिचित लगी.
‘आपकी बेटी की हत्या हुई है.’ एक थकी सी दृष्टि उन पर डालते हुए इंस्पेक्टर ने कहा. ‘हत्यारा पकड़ा गया.’ 
सुधा को लगा जैसे किसी ने उसके मुहं में हाथ ठूंस कर निर्मम अँगुलियों से उसकी जीभ को जकड़ लिया हो. सुबोध की दशा भी एक पर कटे पक्षी जैसी थी. सुधा ने उसकी ओर देखा. सुबोध को लगा कि वह पूछ रही हो कि क्या यह सब उसी के साथ होना लिखा था. सुबोध अपने आप को इतना असहाय पा रहा था कि वह किसी भी प्रश्न का सामना करने की स्थिति में न था.
चिन्नी का अंतिम संस्कार हो गया. सबने सुविधा और परम्परा अनुसार अपनी संवेदना प्रकट की. किसी ने सुझाव दिया तो किसी ने थोडा लताड़ा. किसी ने ढांढ़स बंधाया तो किसी ने भविष्य की ओर इंगित किया.
सुधा को यह शब्द-जाल असहनीय लगा था. परन्तु वह विवश थी. इन बाँझ शब्दों की बाढ़ में, बिना किसी प्रतिरोध के बह जाने के अतिरिक्त उसके पास कोई उपाये न था.
पुलिस जांच-पड़ताल कर रही थी. मीडिया को अपनी बिक्री बढ़ाने का एक सुअवसर मिल गया था. हत्या से सम्बंधित हर बात को खूब सज़ा-संवार कर समाचार पत्रों ने और टी वी चैनलों ने लोगों के सामने प्रस्तुत किया. लोगों की आँखों में एक चमक आ गयी, ‘ऐसी लड़कियां और ऐसे हत्यारे भी हैं इस नगर में? जब लड़कियां रात-रात भर घरों से बाहर रहेंगी तो और परिणाम क्या हो सकता है?’ ऐसे कई प्रकार के विचार यहाँ-वहां व्यक्त हुए.
सुधा को भी समाचार पत्रों से ही पूरा विवरण मिला. चिन्नी अपने मित्रों के साथ एक डिस्को गयी हुई थी. वहीं शरद सेठ अपने मित्रों के साथ आया हुआ था. शरद सेठ के पिता घनश्याम सेठ के पास अरबों रूपए थे. उस अपार धन-संपदा के बल पर पिता-पुत्र निरंकुश जीवन जी रहे थे. शरद माता-पिता की इकलौती सन्तान था. इस कारण बड़े लाड़-प्यार से पला था. शरद की हर गलती, हर शरारत, है अपराध को पिता  भूल-चूक मान कर माफ़ कर देते थे. कुछ लोगों ने दबी आवाज़ में मीडिया को बताया था की शरद शायद तीन हत्यायें पहले भी कर चुका था.
पहली हत्या तब की थी जब स्कूल से निकल कर वह कॉलेज की दहलीज़ पर पहुंचा था. दो-चार लड़कों में कहा-सुनी हो गयी थी. शरद बीच-बचाव करने आया तो एक लड़के ने गुस्से में उसका कालर पकड़ लिया था. शरद ने उसके पेट में छुरा घोंप दिया था. पिता ने उसे उसकी इस मूर्खतापूर्ण हरकत के लिए खूब डांटा था. धन और सम्बन्धों की सहायता से मामला निपटा दिया गया था. इस हत्या के बाद दो और हत्यायें उसने की थीं. पुलिस उसके विरुद्ध कोई भी कार्यवाही करने में सफल न हुई थी. लोगों का मानना था कि पुलिस की असफलता का कारण शरद के पिता की शक्ति ही थी.
शरद ने उस रात चिन्नी के साथ कुछ छेड़छाड़ की थी. चिन्नी ने उसे थप्पड़ मार दिया था. शरद ने अपनी पिस्तौल से चिन्नी के सीने में गोली दाग दी थी.
जिस समय यह घटना घटी उस समय एक पुलिस अधिकारी भी डिस्को में था. पलभर को वह भूल गया कि वह डिस्को मौज-मस्ती करने आया था. झपट कर उसने शरद की धर-दबौचा. शरद के साथ ऐसा कभी न हुआ था. आजतक किसी ने उसे छूने तक का साहस न किया था. इस कारण जब अचानक किसी ने उसे अपनी गिरफ्त में ले लिया तो वह भौंचक्का रह गया. चाह कर भी वह अपने को उस पुलिस अधिकारी की पकड़ से न छुड़ा पाया.
‘क्या हत्यारे को सज़ा मिलेगी?’ सुधा के प्रश्न ने उसे चौंका दिया था. वह स्वयं भी यही सोच रहा था.
‘क्यों नहीं? हत्यारा पिस्तौल सहित पकड़ा गया है. कितने लोग थे वहां. सबने देखा, सुना. जिसने उसे पकड़वाया वह स्वयं एक पुलिस अधिकारी है. वह बच कैसे सकता है?’ सुबोध ने ऐसे कहा जैसे अपने आप को आश्वस्त कर रहा हो.
‘क्या तुम सच में ऐसा मानते हो?’
‘क्यों नहीं?’ सुबोध लगभग चीखते हुए बोला.
‘तुम्हें नहीं लगता कि यहाँ सब कुछ बिकाऊ है. पुलिस बिकाऊ है, वकील बिकाऊं हैं, गवाह बिकाऊं हैं.’
‘तुम कहना क्या चाहती हो?’ सुबोध उसका तर्क सुन कर हड़बड़ा गया था वह जानता था किया जो कुछ सुधा कह रही थी वह सच था.
‘तुमने ही कितना बार पैसे लेकर कितने उलटे-सीधे मामले निपटाए हैं,’ सुधा की वाणी बर्फ समान ठंडी थी.
‘तुम हर बार वही बात लेकर क्यों बैठ जाती हो,’ सुबोध अपने आप से डर रहा था.
‘तुमने भी तो लोगों को फांसने के लिए कई बार जाल बुना होगा. तुम्हें नहीं लगता कि ऐसा ही कुछ यहाँ भी हो सकता है.’
‘क्या कहना चाहती हो तुम?’ सुबोध का स्वर लड़खड़ा गया.
‘घनश्याम सेठ के लिए पुलिस और गवाहों को खरीदना बाएं हाथ का खेल होगा. कुछ लोग तो अपने आपको सौभाग्यशाली मान रहे होंगे, पैसा बनाने का ऐसे स्वर्णिम अवसर बार-बार कहाँ आते हैं.’
सुबोध के पास कोई उत्तर न था. वह उठ खड़ा हुआ. उसने अपने-आप को समझाया कि यह एक अलग स्थिति थी. सारे प्रमाण हत्यारे के विरुद्ध थे. चाह कर भी वह क्या कर पायेगा. उसके लिए सज़ा से बच पाना कठिन होगा, शायद असम्भव होगा. उसने मन ही मन सुधा को कोसा जिसने उसके सामने उलटे-सीधे प्रश्न रख कर उसे विचलित कर दिया था.
अनचाहे ही, वर्षों बाद सुबोध को बचपन की एक घटना याद आ गयी. बारह वर्ष का रहा होगा तब. वह मामा के घर गया हुआ था. मामा के घर के पीछे एक खुला मैदान था. एक दिन उस मैदान में अकेले ही मटरगश्ती कर रहा था. कुछ दूर उसे एक कठफोड़वा दिखाई दिया था. बिना कुछ सोचे-समझे उसने उस पक्षी की ओर एक पत्थर फैंका था. इधर पत्थर हाथ से छूटा उधर पक्षी उड़ा. तभी एक अनहोनी घटी थी. पत्थर उड़ते हुए पक्षी से जा टकराया था. एक पके फल समान पक्षी नीचे धरती पर आ गिरा था. सुबोध भौंचक्का रह गया था. उसने कल्पना भी न की थी कि वह इतना सटीक निशाना लगा सकता था. उसे विश्वास ही न हुआ था कि पत्थर पक्षी को जा लगा था. कुछ पल वह पत्थर की मूरत समान अपनी जगह खड़ा रहा था. फिर थोड़ा सहमा, थोड़ा घबराया वह कठफोड़वे के पास आया था. ज़मीन पर पड़ा पक्षी तड़प रहा था. मन में एक टीस उठी थी. उसने पक्षी को छूना चाहा था, उसके दर्द को कम करना चाहा था. पर वह कुछ भी न कर पाया था. अगली सुबह उसने उस अभागे पक्षी को वहीं मरा पाया था. उसे अपने-आप पर बहुत गुस्सा आया था. उसकी मूर्खता के कारण एक निर्दोष पक्षी ने अपनी जान गवां दी थी.
न जाने क्यों सुबोध को इतने समय के बाद उस घटना की याद आई. लगा कि मन के भीतर दबी एक टीस बाहर निकलने को छटपटा रही थी.
अदालत में सुनवाई शुरू हुई. जिस पुलिस अधिकारी ने हत्यारे को धर-दबौचा था वह मुख्य गवाह था. उसने अदालत को बताया कि घटना वाली रात वह किसी आवश्यक कार्य से सुल्तानपुर गया हुआ था. उसने कहा कि उसे आश्चर्य इस बात से था कि उसका नाम इस मामले से कैसे जुड़ गया क्योंकि जिस समय यह घटना घटी थी उस समय वह घटना स्थल से सैंकड़ों मील दूर था. अपनी बात को प्रमाणित करने के लिए उसने कार्यालय द्वारा जारी किया हुआ वह आदेश दिखाया जिसके अंतर्गत वह सुल्तानपुर गया था.
सरकारी वकील ने बड़ी तीखी जिरह की. जिरह के बाद पूरी तरह प्रमाणित हो गया कि वह अधिकारी न तो हत्या के विषय में कुछ जानता था न ही उसने हत्यारे को पकड़वाने में कोई भूमिका निभायी थी.
अदालत की कार्यवाही धीरे-धीरे आगे बड़ी. एक के बाद एक गवाह आये. किसी ने कहा कि उसने कोई हत्या होते नहीं देखी, किसी ने कहा कि अभियुक्त शायद उस समय डिस्को में नहीं था, किसी ने कहा कि एक नहीं तीन-चार गोलियां चलीं थीं. अभियुक्त की ओर से कहा गया कि उस समय वह शिमला के एक अस्पताल में अपना इलाज करवा रहा था, वहां कुछ उल्टा-सुलटा खाने से बीमार पड़ गया था. अस्पताल का पूरा रिकॉर्ड उसने प्रस्तुत किया था.
सुधा उठ कर अदालत से बाहर आ गई. एक आक्रोश था जो भीतर उबल रहता. सुबोध भी उसके पीछे-पीछे बाहर आ गया.
‘सब बिक चुके हैं,’ अनायास ही उसके मुंह से निकला. सुधा ने भावहीन आँखों से उस की ओर देखा.
‘सब बिक चुके हैं,’ वह चिल्लाया.
‘क्या तुम न जानते थे कि ऐसा ही होने वाला था? वर्षों तक तुम अपने को बेचते रहे, कभी रुपयों के लिए, कभी हीरों के हार के लिए, कभी गाड़ी के लिए, कभी विदेश यात्रा के लिए. वर्षों तक, मेरी बातों की अवहेलना कर, तुम घनश्याम सेठ जैसे लोगों के हाथ बिकते रहे. आज तुम क्रोधित हो सिर्फ इस बात को लेकर कि कुछ और लोग अपने-आप को बेच रहे हैं. तुम्हारी बेटी के हत्यारे ने उन्हें खरीद लिया है.’ सुधा पर जैसे पागलपन छा गया और वह चिल्लाई, ‘वह साफ़ छूट जाएगा और तुम देखते रह जाओगे. परन्तु आज तुम किस अधिकार से क्रोधित हो रहे हो. तुम में और उन में अंतर ही क्या है, बताओ मुझे.’
सुबोध को लगा कि वह एक ऐसा पक्षी है जो अचानक किसी पत्थर से टकरा, धरती पर आ गिरा है. पर वह जानता था कि वह उस कठफोड़वे के सामान निर्दोष न था जिस कठफोड़वे की मृत्यु उसकी मूर्खता के कारण हुई थी. 
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©आइ बी अरोड़ा 

Wednesday, 1 June 2016


एक निर्दोष पक्षी की ह्त्या  (भाग 3)
सुबोध ने उसे कई प्रकार से उसे लुभाने और बहलाने का प्रयास किया था, परन्तु सफल न हो हुआ था. हार कर और थोड़ा चिढ़ कर वह चिन्नी को रिझाने लगा था. पैसों से जो ऐश्वर्य वह सुधा के लिए बटोरना चाहता था वह चिन्नी के लिए बटोरने लगा.
चिन्नी सुंदर थी, बुद्धिमान थी. लेकिन सुबोध ने उसके मन में धन व सुख-सुविधाओं के लिए एक ललक पैदा कर दी थी. बेटी की हर इच्छा पूरी करने को वह आतुर रहता था. चिन्नी भी आये दिन कोई न कोई मांग पिता के सामने रख देती थी.
‘इस सब का अंत क्या होगा? क्या कभी तुम ने इस पर भी विचार किया है?’ एक दिन सुधा ने कहा था.
‘अर्थात?’ सुबोध अब खुल कर बहस भी न करना चाहता था. उसने सुधा के विरोध को स्वीकार कर लिया था और कभी भी अपनी इच्छाओं को उस पर थोपने का प्रयास न किया था. सुधा भी जीवन के कटु यथार्थ को स्वीकार कर चुकी थी. परन्तु भ्रष्टाचार से उगाही धन-सम्पत्ति को भोगना उसे स्वीकार न था. इस कारण वह एक सीमित जीवन जीने लगी थी. हर पल उसके मन में एक कशमकश चलती रहती थी. उसे लगता था कि उसे सुबोध का पूर्णरूप से विरोध करना चाहिए. कभी-कभी उसका मन उसे धिक्कारता कि उसका नपुंसक विरोध अर्थहीन था.
‘अर्थात, इतनी धन-सम्पत्ति तुम किस के लिए और क्यों इकट्ठी कर रहे हो? भ्रष्टाचार से उपजा यह धन क्या कभी हमारा कल्याण कर पायेगा?’
‘अपने विभाग में मैं अकेला नहीं हूँ. ऊपर से नीचे तक सब यही करते हैं. इतना ही नहीं यह नेता, यह मंत्री सब इसी धन के बल पर राजनीति में टिके हैं और हम सब पर राज कर रहे हैं.’
‘अगर संसार के सभी लोग भ्रष्ट हो जाएँ तब भी भ्रष्टाचार को सही नहीं ठहराया जा सकता. गलत बात हर स्थिति में गलत होती है.’
‘कई वर्षों से हम इस विषय पर बहस करते आये हैं. न कभी हम पहले एकमत हुए थे न आगे होंगे. अच्छा होगा कि तुम ऐसे प्रश्न उठाओ ही नहीं,’ सुबोध ने बात समाप्त करते हुए कहा. सुधा समझ रही थी कि उसका कुछ कहना निरर्थक ही होगा.
इस बीच सुबोध एक मामले में फंस गया. हुआ यह कि उसके कार्यालय के कुछ लोग उससे जलने लगे. उन्होंने सतर्कता विभाग के एक अधिकारी से मिलकर सुबोध के विरुद्ध कार्यवाही करने की साज़िश रची. पैसों का लेन-देन भी हुआ. सुबोध को एक केस में फंसा दिया गया. वह पूरी तरह डर गया. उसे लगा कि वह सब कुछ खो बैठेगा, कि इतने वर्षों से सुधा जो कहते आई थी वह सब सच हो जाएगा. विभाग की कार्यवाही से अधिक वह सुधा से डर रहा था. वह चिंतित था कि अगर सुधा को पता चल गया तो वह अवश्य ही कहेगी कि ऐसा तो एक दिन होना ही था. वह जानता था कि ऐसी स्थिति में सुधा का सामना करना उसके लिए असम्भव होगा.
उसने अपने एक मित्र से सहायता मांगी. मित्र ने थोड़ी छानबीन की, बात की तह तक पहुंचा और कुछ ले-देकर मामला निपटाने का सुझाव दिया. सुबोध ने उसकी सलाह मान ली. जैसे-तैसे सुबोध ने इस झंझट से झुटकारा पाया, पैसों की उसे परवाह न थी. वह तो बस बेदाग़ छूटना चाहता था.
छह माह तक वह इस पचड़े में फंसा रहा था. इन छह महीनों का एक-एक पल उसने ऐसे बिताया था जैसे कि वह उम्र कैद काट रहा हो. इस कैद से छूटते ही उसने दुगनी गति से पैसे पैसे बनाने शुरू कर दिए थे. सुधा को उसने किसी भी तरह का आभास तक न होने दिया था.
उधर कॉलेज में पदार्पण करते ही चिन्नी को पंख लग गए थे. पंख नन्हे थे पर पिता के प्रोत्साहन ने उन नन्हे पंखों में एक उमंग भर दी थी. चिन्नी दूर-दूर तक उड़ने लगी थी. वह कब घर से जाती, कब आती इसका कॉलेज की उपस्थिति से कोई सम्बन्ध न रहा. कई बार सुधा को देर रात तक उसकी प्रतीक्षा करनी पड़ती. परन्तु सुबोध को जैसे इस सब में कुछ भी असामान्य न लग रहा था. उसने न कभी चिन्नी को रोका. न कभी टोका. उल्टा चिन्नी जब भी, जो भी मांग करती वह पलभर में पूरी कर देता.
सुधा ने एक-दो बार उसे चेताने का प्रयास किया था. परन्तु सुबोध ने जैसे मन में ठान लिया था कि वह सुधा की किसी बात की ओर ध्यान न देगा.
कभी-कभी सुधा को लगता कि सुबोध सिर्फ उसे प्रताड़ित करने के लिए चिन्नी को सिर पर चढ़ा रहा था. वह चिन्नी की हर इच्छा पलभर में पूरी करता, शायद यह जताने के लिए कि यह सब वह अपनी पत्नी के लिए करना चाहता था. सुधा अस्थिर हो जाती. सोचती कि कहीं उसका हठ चिन्नी के जीवन में उलझन न उत्पन्न कर दे. परन्तु चाह कर भी वह भ्रष्टाचार से अर्जित सम्पत्ति को भोगने में अपने को असमर्थ पाती. वह धन-सम्पत्ति उसे ऐसी दलदल समान लगती जिस में फंस कर बाहर निकलने का कोई उपाए न था.
एक रात चिन्नी बहुत देर तक घर न लौटी. सुधा का मन अशांत हो गया. सुबोध कब का सो चुका था. उसे निश्चिंत सोता देख सुधा की उलझन और बेचैनी बढ़ती जा रही थी. उसे आश्चर्य था की सुबोध अपनी बेटी की जीवनशैली को सामान्य कैसे मान रहा था, जब कि उन्हें यह भी नहीं पता कि उसके मित्र कौन थे? कैसे थे? माँ को इन सब बातों के विषय में बताना चिन्नी ने कभी आवश्यक न समझा था. सुधा को कभी-कभी लगता कि वह अपने पति और बेटी से दूर होती जा रही थी, जैसे पिता-पुत्री ने अपने लिए एक अलग संसार रच लिया था.
पिता और पुत्री का धन और सुख-सुविधाओं के प्रति आकर्षण जितना बढ़ रहा था उतनी ही सुधा के मन में उदासीनता बढ़ती जा रही थी.
अचानक फोन की घंटी बजी. सुधा ने घड़ी की ओर देखा. दो बज चुके थे. उसने घबरा कर फोन उठाया. फोन किसी पुलिस अधिकारी ने किया था. उन्हें तुरंत अस्पताल आने को कहा था.
‘क्या हुआ है?’ सुधा लगभग चीखती हुई बोली.
‘आपकी बेटी के साथ एक दुर्घटना घट गई है. उसका आपरेशन किया जाना है.’
सुधा ने सुबोध को जगाया. बदहवास से दोनों अस्पताल पहुंचे. एक पुलिस इंस्पेक्टर से सामना हुआ. उसका चेहरा बेहद सख्त लगा.

‘मुझे अफ़सोस है, आपकी बेटी की मृत्यु हो गयी है.’ इन कठोर और निर्मम शब्दों ने उनका स्वागत किया. (कहानी का अंतिम भाग अगले अंक में)
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©आइ बी अरोड़ा 

Tuesday, 31 May 2016

एक निर्दोष पक्षी की ह्त्या  (भाग 2)
जीवन ने वसंत का रूप ले लिया. हर ओर सुंदर पुष्प थे, पुष्पों की सुगंध थी, रंग-बिरंगी तितलियाँ थीं, चहचहाते पक्षी थे, नीले आकाश में मधुर गति से तैरते बादलों के गुच्छे थे. हर पल कुछ न कुछ गुनगुनाने को मन उत्सुक रहता था. जीवन, इन्द्रधनुष समान, इस छोर से उस छोर तक फैला लगता था.
इन्हीं रस भरे दिनों की बात है कि सुधा और सुबोध एक पार्टी में गए थे. अब सुधा को ठीक से याद भी नहीं कि वह पार्टी किसने दी थी और क्यों दी थी. सुबोध के कई सहकर्मी पति, पत्नियों के साथ आये थी.
हलके-हलके कहकहों के बीच सुधा कभी एक से बात कर रही थी तो कभी दूसरे से. तभी तारा गुप्ता ने आकर कहा था, ‘अच्छा, तुम हो सुबोध की भाग्यलक्ष्मी. तुम से मिलने को मैं बहुत आतुर थी.’
‘मैं भाग्यलक्ष्मी नहीं, सुधा हूँ,’ उसने भोलेपन से कहा था.
‘हाउ स्वीट, तुम सुधा हो, यह मैं भी जानती हूँ. पर क्या तुम जानती हो कि जब से सुबोध ने तुम से विवाह किया है तभी से उसका भाग्य पलट गया है?’ तारा गुप्ता की वाणी में ईर्ष्या ही नहीं, कड़वाहट भी थी.
‘मैं कुछ समझी नहीं?’ सुधा सच में ही कुछ समझ न पाई थी.
‘अब इतनी भोली भी तो तुम नहीं हो, या हमें मूर्ख समझती हो? यह जो हीरों का हार तुमने पहन रखा है, दस बारह लाख से कम का न होगा. कहाँ से आया यह? विवाह के बाद ही सुबोध को एक से बढ़कर एक बढ़िया पोस्टिंग मिली हैं. जहाँ सब लोग कलम घिस रहे हैं सुबोध मज़े से नोट छाप रहा है.’ 
सुधा स्तब्ध रह गयी. उसने कल्पना भी न की थी. ‘सुबोध एक भ्रष्ट अधिकारी है?’ इस प्रश्न ने उसे झंझोड़ दिया. उसने सुबोध की ओर देखा. अपने मित्रों के साथ खड़ा वह कोई ड्रिंक ले रहा था. उसकी मुस्कुराहट को देखा, उसकी चमकती आँखों को देखा, लगा तारा गुप्ता ने अवश्य ही झूठ कहा होगा, सुबोध ऐसा नहीं हो सकता. अनायास ही उसका हाथ गले में बंधे हीरों के हार की ओर गया. उसने हार छुआ और सिहर उठी. अगर यह हार दस बारह लाख का है तो इतने पैसे सुबोध के पास कहाँ से आये? उसे लगा कि कहीं से आकर तपती रेतीली हवा उसके चारों ओर फ़ैल गयी थी. उसे लगा कि उसका दम घुटा जा रहा था.
‘यह हार कितने का है?’ घर लौटते ही उसने पूछा था.
‘इस समय तुम्हें यह क्या सूझा?’
‘यह मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं है.’
‘उस दिन बताया तो था.’
‘तुम्हें पोर्ट एरिया का चार्ज कब मिला?’
‘तुम्हें किसने कहा?’
‘तारा गुप्ता ने.’
‘वह चिढ़ती है मुझसे.’
‘क्या तुम घूस लेते हो?’
सुबोध को लगा कि जैसे किसी ने उठा कर उसे धरती पर पटक दिया था और उसकी छाती पर चढ़ कर बैठ गया था. अचानक शब्दों ने उसका साथ छोड़ दिया. विचार तिरोहित हो गए. उसने बहुत प्रयास किया पर कुछ कह न पाया.
सुधा इस तरह सीधे और सपाट शब्दों में उससे यह प्रश्न कर बैठेगी इसकी उसने कल्पना भी न की थी. उसके मन में संदेह तो था कि सुधा को उसका घूस लेना अच्छा न लगेगा. परन्तु उसे यह आशंका न थी कि उसकी प्रतिक्रिया इतनी तीखी और स्पष्ट होगी. वह हतप्रभ हो गया, परन्तु थोड़े काल के लिए ही. मन के किसी कोने से आवाज़ आई, चलो अच्छा ही हुआ, आज नहीं तो कल सुधा को इस बात का पता चलना ही था, आज नहीं तो कल इस तूफ़ान को आना ही था, आज नहीं तो कल मुझे इस स्थिति को झेलना ही था.
सुधा को किसी उत्तर की प्रतीक्षा न थी. सुबोध के विवर्ण चेहरे को देख कर ही वह सत्य जान गई थी. उसने कुछ कहा नहीं. इस स्थिति में शब्दों का सहारा लेना उसे निरर्थक लगा था.
कुछ दिनों तक दोनों एक-दूसरे से खिंचे-खिंचे से रहे थे. सुधा इस बात को स्वीकारने में अपने-आप को असमर्थ पा रही थी कि उसका पति एक भ्रष्ट अधिकारी था. अब तक वह समझे बैठी थी कि उसके पिता के समान ही सुबोध एक ईमानदार, चरित्रवान पुरुष था.
उसकी माँ ने उसे कितनी बार बताया था कि उसके पिता सरकार के जिस विभाग में कार्यरत थे वहां भ्रष्टाचार ने, एक रोग की भाँति, सभी कर्मचारियों को ग्रसित कर रखा था. परन्तु उसके पिता ने तो ईमानदारी से कार्य करने का व्रत ले रखा था. इस कारण उन्हें बहुत कष्ट भी उठाने पड़े थे. एक झूठे मामले में उनके विरुद्ध अनुशासनिक कार्यवाही भी हुई थी. तीन माह तक वह निलंबित भी रहे थे. परन्तु अपने निश्चय से वह कभी भी नहीं डिगे थे.
पिता की जो छवि उसके मन पर अंकित हो गई थी उसने उसकी सोच को बहुत प्रभावित किया था. शायद यही कारण था कि बिना जाने ही उसने मान रखा था कि सुबोध भी एक ईमानदार अधिकारी था.
अब अचानक एक चक्रवात ने सुधा को घेर लिया था. घर की हर वस्तु उसे दूषित लगने लगी थी. जितनी भी सुख-सुविधायें सुबोध ने जुटायीं थीं वह सब अपवित्र लगने लगीं थीं. उसे समझ न आ रहा था कि ऐसा कब तक चलेगा. कई प्रश्न, फन उठाये, नागों समान उसके सामने खड़े हो गए थे. क्या वह कभी सामान्य हो पायेगी? क्या भ्रष्टाचार से अर्जित की हुई संपत्ति का भोग कर पाएगी? क्या उनका विवाहित जीवन अभिशप्त हो जाएगा?
जिस चक्रवात में सुधा अनचाहे ही फंस गई थी, समय की मार ने धीरे-धीरे उसे प्रभावहीन कर दिया. वह कुछ सामान्य हुई. परिस्थितियों को फिर से समझने का उसने प्रयास किया. सोच-विचार कर उसे एक ही रास्ता दिखाई दिया, उसे सुबोध को समझाना होगा, उसे सही रास्ते पर लाने का एक प्रयास करना होगा.
बड़े हौले से उसने बात छेड़ी, अपने मन की दुविधा बताई, अपनी इच्छा से अवगत कराया, अपने प्यार का वास्ता दिया, भविष्य के प्रति उपजी अपनी आशंका की ओर इंगित किया. परन्तु सुबोध पर किसी बात का कोई प्रभाव न पड़ा. उसके मन में कोई संदेह न था. उसने कह दिया कि वह जीवन का भरपूर आनंद उठाना चाहता है और ऐसा तभी संभव है जब पास में धन हो. उसने स्पष्ट कर दिया कि उसे धन चाहिये, धन चाहे कैसा भी हो, चाहे कैसे भी आये.

सुधा डावांडोल हो गयी. परन्तु फिर भी उसने कई बार सुबोध को टोका, कई बार समझाया, कई बार रोका. परन्तु सुबोध ने उसकी एक न सुनी और खूब पैसा बनाया. कई बार वह मामलों को जानबूझ कर उलझा देता था. विवश हो कर दूसरे को उसकी इच्छानुसार पैसे देने ही पड़ते थे. करोड़ों रूपए की सम्पत्ति उसने कुछ ही वर्षों में इकट्ठी कर ली थी. लेकिन यह धन-सम्पदा सुधा को रत्तीभर आकर्षित न कर पायी थी.(क्रमशः)
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©आइ बी अरोड़ा 

Monday, 30 May 2016

एक निर्दोष पक्षी की ह्त्या  
(एक लम्बी कहानी भाग 1)
‘हम सब प्रयास कर रहे हैं. हम अपराधी को सज़ा दिला कर ही रहेंगे. अगर यहाँ निर्णय हमारे पक्ष में न हुआ तो हम अपील दायर करेंगे. हाई कोर्ट जायेंगे. आवश्यक हुआ तो सुप्रीम कोर्ट भी जायेंगे. परन्तु हम हत्यारे को छोड़ेंगे नहीं. इस बार वह बच न पायेगा. यह चौथी हत्या है जो उसने की है. आज तक उसे सज़ा नहीं मिली. परन्तु इस बार ऐसा न होगा. हम उसे सज़ा दिला कर रहेंगे, हमें कुछ भी करना पड़े. बस, प्लीज् आप थोड़ा धैर्य रखें.’
सुबोध सुन रहा था, पर उसे कुछ भी समझ न आ रहा था. कई विचारों, दुविधाओं व चिंताओं ने उसे एक साथ उसे घेर लिया था. ‘यह सब क्या हो रहा है? सामने बैठा व्यक्ति जो कुछ कह रहा है क्या उसका कोई अर्थ भी है? क्या परिस्थितियाँ उसका उपहास कर रही हैं? यह सब उसके साथ ही क्यों हो रहा है? कहाँ गलती हो गयी? क्या गलती हो गयी?’
एक के बाद एक उठते प्रश्न उसे विचलित करने लगे. अचानक वह उठ खड़ा हुआ और चल दिया. उसे यह भी ध्यान न रहा कि वह अकेला न था. सुधा भी साथ थी. सुधा उसके व्यवहार से थोड़ा घबरा गई थी. लगभग भागती हुई वह उसके पीछे आई.
कार के निकट पहुँच कर ही सुबोध को पत्नी का ध्यान आया. वह एकदम पलता. पलटते ही सुधा को अपने सामने पाया. उसे लगा कि वह उसे ऐसे देख रही थी जैसे कि वह उसका पति नहीं कोई अपरिचित हो. उस क्षण उसे लगा कि अब वह सब कुछ खो बैठा था.
‘तुम्हें आश्चर्य हो रहा है?’ सुधा का प्रश्न एक खंजर-सा उसके भीतर चुभ गया. बिना कुछ कहे ही वह गाड़ी चलाने लगा. उसे उस दिन की याद आई जिस दिन वह नई गाड़ी लेकर घर आया था. पुरानी कार  बस एक वर्ष पुरानी थी. फिर भी, जैसे ही एक नया मॉडल बाज़ार में आया था, उसने नवानी को फोन कर नई कार लेने की अपनी इच्छा व्यक्त की थी. नवानी का केस उसके पास फंसा हुआ था.
अगले ही दिन नई गाड़ी लेकर नवानी हाज़िर हो गया था. गाड़ी देखकर सुबोध चहक उठा था. ‘नवानी साहब, आपका चुनाव तो लाजवाब है. क्या कलर चुना है. अब समस्या यह है कि इस पुरानी कार का क्या करूं?’
नवानी के लिए संकेत ही बहुत था. पुरानी गाड़ी वह साथ लेता गया था. दो दिन बाद उसने चार लाख रूपए भिजवा दिए थे. सुबोध ने मन ही मन कहा था, ‘अच्छा सौदा रहा, बाज़ार में तीन-साढ़े तीन से अधिक न मिलते.’
नई कार देख कर पत्नी के चेहरे पर प्रसन्नता की हल्की-सी लहर भी न उठी थी. उसने यह भी न पूछा था कि गाड़ी कब और कैसे खरीदी. बस इतना ही कहा था, ‘अभी भी समय है, सोचो, तुम यह सब क्यों और किस के लिए कर रहे हो. इस अब का अंत कहाँ और कैसा होगा.’
चिन्नी प्रसन्नता से उछल पड़ी थी. पिता की हर सफलता का वह भरपूर स्वागत करती थी. उसके उत्साह और उसकी प्रफुल्लता को देख कर सुबोध पूरी तरह संतुष्ट हो जाता था. उसे चिन्नी पर बहुत गर्व था. चिन्नी ने उसके जीवन की उस शून्यता को थोड़ा-बहुत भर दिया था जिस शून्यता को सुधा ने उसके जीवन में रोप दिया था.
‘पापा, यह गाड़ी आप मुझे दे दो. आप पुरानी गाड़ी से अपना काम चला लो. मेरे सब फ्रेंड्स अपनी-अपनी गाड़ियों में आते हैं. सिर्फ मैं ही हूँ जिसके पास अपनी गाड़ी नहीं है. इस गाड़ी को देख कर सब जल-भुन कर रह जायेंगे.’
‘ऐसा नहीं हो सकता.’
‘क्यों? क्यों? क्यों?’
‘इसके दो कारण हैं. पहला कारण, तुम भूल रही हो कि तुम अपना ड्राइविंग लाइसेंस खो बैठी हो और अभी तक तुमने अपना नया लाइसेंस नहीं बनवाया है. दूसरा कारण, मैंने पुरानी गाड़ी बेच दी है.’
‘पापा, यू कांट डू दिस टू मी.’
अचानक एक झटका लगा. सुबोध जैसे नींद से जागा, ‘ध्यान ही न रहा, शायद स्पीड ब्रेकर था.’
‘मैंने तुम्हें कई बार चेताया था. परन्तु तुम ने मेरी एक न सुनी. आज परिणाम तुम्हारे सामने है.’ सुधा की वाणी में न क्रोध था, न क्षोभ. सिर्फ एक हताशा थी, हताशा जो अब सुबोध के मन में भी समाने लगी थी.
सुधा से उसका विवाह उसकी मां की इच्छा के अनुसार हुआ था. वह माँ की एक सहेली की बेटी थी. पाँच-सात वर्ष की थी जब उसके पिता का निधन हो गया था. मां ने कई कष्ट झेल कर बेटी को पाला-पोसा था. वह सुंदर पर सीधी-साधी लड़की थी. बी ए पास करने के बाद कुछ करने का सोच ही रही थी कि सुबोध की माँ ने विवाह की बात छेड़ दी थी. सुधा की माँ को अपने कानों पर विश्वास न हुआ था. पति की मृत्यु के बाद वह पूरी तरह निराश हो चुकी थी. जो कुछ पति छोड़ गए थे उससे तो बस दो-चार वर्ष ही ठीक से निर्वाह कर पाई थी. अब उसके पास ऐसा कुछ भी न था जिस के सहारे वह किसी संपन्न परिवार में सुधा का विवाह करने का सपना देखती.
सुबोध प्रशासनिक सेवा की परीक्षा में सफल होकर आयकर विभाग का एक अधिकारी बन चुका था. कई संपन्न परिवारों से संकेत आ रहे थे. सब लाखों रूपए का दहेज़ देने को भी तैयार थे. परन्तु सुबोध की माँ को सुधा भा गयी थी. उसकी सुन्दरता से अधिक उसके स्वभाव ने उन्हें मोह लिया था. सुबोध अपने ही विभाग में कार्यरत एक लड़की से विवाह करना चाहता था. ट्रेनिंग के समय दोनों साथ ही थे. तभी से वह सुबोध को अच्छी लगती थी. परन्तु वह इतना लजीला था कि उस लड़की के सामने विवाह का प्रस्ताव रखने का कभी साहस ही न कर पाया था. एक दिन उस लड़की ने भारतीय प्रशासनिक सेवा के एक अधिकारी से विवाह कर लिया. सुबोध अपने आप से खीज उठा और उसने तुरंत माँ का प्रस्ताव मान लिया.
सुधा को सब कुछ स्वप्न समान लगा था. उसने कल्पना भी न की थी कि सब कुछ ऐसे होगा. सुबोध उसे किसी राजकुमार से कम न लगा था. वह सोचती कि ऐसा तो सिर्फ परी कथाओं में होता है कि कहीं दूर देश से अचानक आकर कोई राजकुमार किसी सिंड्रेला के साथ विवाह कर लेता है.
सुधा की प्रसन्नता की कोई सीमा न थी. जीवन में सब कुछ बहुत ही सुंदर व मधुर लगने लगा था. सारा खालीपन पल भर में भर गया था. सारे कांटे गुलाबों में परिवर्तित हो गए थे. आकाश छूती, उफनती लहरें मासूम-सी लगने लगीं थीं.

सुधा अपनी इस अनुभूति को अपने पति के साथ भरपूर बांटना चाहती थी. वह चाहती थी कि उनका विवाहित जीवन सौन्दर्य और सुख से परिपूर्ण हो. अपनी इस कामना को जीवंत करने का पूर्ण प्रयास किया उसने. सुबोध भी सुधा के निश्छल प्रेम की धारा में ऐसा बहा कि वह भूल ही गया कि कुछ दिन पहले उसका मन कड़वाहट से भरा पड़ा था.(क्रमशः)
©आइ बी अरोड़ा 

Monday, 23 May 2016

जोकर
‘वह सर्कस में काम करते हैं, वह एक जोकर हैं.’
‘वो लापता क्यों हो गया है?’ पुलिस इंस्पेक्टर का वाणी उकताहट से भरी हुई थी.
‘मुझे नहीं पता, तीन दिन पहले वह, अपना काम पूरा कर, सर्कस से घर लौट रहे थे. लेकिन वह घर नहीं पहुंचे. हम सब बहुत चिंतित है. बच्चों ने तो कल से कुछ खाया भी नहीं, वह सब डरे हुए हैं.’
‘क्या तुम ने सर्कस वालों से बात की? उसके साथियों से या दोस्तों से कोई पूछताछ की?’
‘हाँ, पर इतना ही पता चला कि वह उस रात शो समाप्त होने के बाद घर चले गए थे. इसके अतिरिक्त कोई कुछ नहीं जानता.’
‘तुम जाओ, हम मामले की छानबीन करेंगे......जितना जल्दी हो सके,’ इतना कह इंस्पेक्टर किसी और से बात करने लगा. जोकर की पत्नी असमंजस में डूबी कुछ पल वहीं खड़ी रही. इंस्पेक्टर ने उसे उखड़ी हुई दृष्टि से देखा तो थोड़ी सहमी, थोड़ी घबराई वहां से चल दी. कई आशंकायें मन में उठ रहीं थीं. उसे भय था कि उसके पति को ढूँढने हेतु पुलिस कुछ भी न करेगी. उसे लग रहा था कि पति के साथ कोई अनहोनी घटना अवश्य घटी है.
उनके विवाह को अभी पाँच वर्ष ही हुए थे, पर वह दोनों तो बचपन से ही एक दूसरे के साथ थे. उसके बिना अकेले जीने की तो वह कल्पना भी न कर सकती थी.
पुलिस ने थोड़ी-बहुत जांच की. सर्कस के निकट स्थित एक दस- मंजिला इमारत की छत पर उन्हें जोकर के रंग-बिरंगे, भड़कीले जूते मिले. पुलिस को यह बात बहुत ही आश्चर्यजनक लगी, पर वह किसी निष्कर्ष पर न पहुँच पायी.
एक दिन सर्कस के एक असंतुष्ट कर्मचारी ने पुलिस इंस्पेक्टर के पास चुपके से आकर बताया कि जोकर एक ऐसा अकेला कर्मचारी न था जो लापता हुआ था, पिछले एक वर्ष में तीन अन्य कर्मचारी भी लापता हो गए थे. उन के परिवारों को शायद इस बात का पता भी नहीं चला, एक बेचारे का तो कोई परिवार था भी नहीं.
‘सर, अगर मेरा नाम किसी को न बताएं तो मैं आपको एक बात बता सकता हूँ. इस सर्कस के तीन पार्टनर हैं. इन में से एक पार्टनर बहुत ही बुरा आदमी है. कर्मचारियों के साथ बहुत गलत व्यवहार करता है. मर्दों के साथ, औरतों के साथ. आप समझ रहें हैं न कि मैं क्या कह रहा हूँ, बहुत ही कामुक आदमी है वह शैतान है.’
पुलिस इंस्पेक्टर ने इस सुराग की कोई ख़ास छानबीन न की. उसे तो संदिग्ध व्यक्ति से पैसे ऐंठनें के एक सुनहरा अवसर मिल गया था. वह इस अवसर को चुकने वाला न था.
छह माह बीत गए. उसे सूचना मिली कि उसका इकलौता बेटा सड़क  दुर्घटना में घायल हो गया था. उसे रात आठ बजे सूचना मिली और रात ग्यारह बजे की ट्रेन से वह घर की ओर चल दिया.
ट्रेन में उसे कब नींद आई उसे पता ही न चला. वह गहरी नींद में था कि अचानक गाड़ी रुक गयी. उसकी नींद टूट गयी. रात के दो बज रहे थे. उसने खिड़की से बाहर झांका. बाहर अँधेरा था, कोई सुनसान जगह थी. उसने अंदाज़ लगाया कि गाड़ी किसी स्टेशन पर न रुकी थी.
तभी उसकी नज़र सामने वाले बर्थ पर पड़ी. उस बर्थ पर एक व्यक्ति, बड़े अजीब से कपडे पहने बैठा था, सिर पर एक टोप पहन रखा था.  चेहरे पर कोई मुखौटा सा पहन रखा था. नाक पर लाल रंग लगा रखा था.
‘सर्कस का जोकर लगता है,’ पुलिस इंस्पेक्टर ने मन ही मन कहा.
‘आपको ऐसा नहीं करना चाहिए था,’ उस व्यक्ति ने कहा, उसकी आवाज़ बहुत धीमी और बर्फ की तरह ठंडी थी.
‘क्या कहा तुमने?’ पुलिस इंस्पेक्टर ने तेज़, झल्लाई हुई आवाज़ में कहा.
‘आप कितने नीच व्यक्ति हैं? आपने एक हत्यारे के साथ समझौता कर लिया, आपने ज़रा भी नहीं सोचा उन भाग्यहीनों के बारे में? इसका परिणाम अच्छा न होगा, इतना तो निश्चित है. जीवन भर आप पछतायेंगें, मेरी बात याद रखना.’
पुलिस इंस्पेक्टर अवाक हो गया. उसके दिल की धड़कन तेज़ हो गयी. उसने कुछ कहने का प्रयास क्या पर शब्दों ने उसका साथ न दिया. तभी ट्रेन चलने लगी. वह व्यक्ति उठ खड़ा हुआ. अचानक पुलिस इंस्पेक्टर ने देखा कि वह जोकर-सा दिखाई देने वाला व्यक्ति नगें पाँव था. वह चलती ट्रेन से बाहर निकल गया.
सुबह पाँच बजे ट्रेन पुलिस इंस्पेक्टर के नगर पहुंची. उसने घर जाने के बजाय अस्पताल जाना ही उचित समझा और सीधा अस्पताल चल दिया.
वहां पता चला कि उसका बेटा मौत के मुंह से लौट कर आया था. सड़क दुर्घटना बहुत ही भयानक थी. वह अपने मित्र के साथ उसके बाइक पर सवार था. मित्र की तो दुर्घटना-स्थल पर ही मृत्यु हो गयी थी.
उसने डॉक्टर का बार-बार धन्यवाद दिया.
‘धन्यवाद मुझे नहीं उस भले-मानस को दीजिये जो समय रहते आपके बेटे को अस्पताल ले आया. अगर थोड़ी भी देर हो जाती तो शायद हम चाह कर भी इसे बचा न पाते.’
‘इसे अस्पताल लेकर कौन आया था?’
‘कोई सर्कस वाला लग रहा था. वह तो सारी रात यहाँ रुका रहा. आपकी पत्नी की ऐसी दशा न थी कि बेटे की देखभाल कर पाती या भागदौड़ कर पाती. इस कारण वह बेचारा रात भर यहीं रुका रहा. अभी-अभी गया है. अगर आप पाँच मिनट पहले पहुँचते तो आप से मुलाकात हो जाती.’
‘कौन था वह?’ पुलिस इंस्पेक्टर ने सहमी सी आवाज़ में पूछा.
‘कोई जोकर-सा था......सर्कस का. सर पर टोप, नाक पर लाल रंग. पर एक बात थोड़ी अजीब लगी, उसने कोई जूते न पहन रखे थे. नंगे पाँव था.’
भौंच्च्का-सा खड़ा पुलिस इंस्पेक्टर फटी-फटी आँखों से डॉक्टर को देखने लगा. उसकी टाँगे हल्के से कांप रहीं थीं.
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© आइ बी अरोड़ा


Friday, 20 May 2016

प्रतीक्षालय (एक कहानी)
एक मित्र के अंतिम संस्कार में भाग लेने हेतु मुझे उसके गाँव, अमीरपुर जाना पडा. हम दोनों एक साथ सेना में थे. सन इकहत्तर की लड़ाई में हम दोनों ने ही भाग लिया था. उस युद्ध में वह बुरी तरह घायल हो गया था. उसकी दोनों टांगें काटनी पडीं थीं. सेना से उसे सेवानिवृत्त कर दिया गया.
अमीरपुर गाँव में उसकी पुश्तैनी ज़मीन थी. वह अपने गाँव चला आया. पर साधारण खेती करने के बजाय उसने बीज पैदा करने का काम शुरू किया. कई दिक्कतें आयीं, पर वह हार मानने वाला न था.
सुचना मिली कि उसका अचानक निधन हो गया था. किसी को भी विश्वास न हुआ. सेना के कई साथी अंतिम संस्कार में भाग लेने अमीरपुर आये.
लौटने के लिए मुझे रात ग्यारह बजे राजपुर से गाड़ी लेनी थी. मैं दस बजे ही स्टेशन पहुँच गया था. वहां पहुँचने के बाद पता चला कि ट्रेन तीन घंटे की देरी से चल रही थी. मैंने अपने को कोसा, चलने से पहले ही थोड़ी पूछताछ कर लेनी चाहिये थी. अब तीन घंटे स्टेशन पर बिताने पड़ेंगे. इस बात का भी भरोसा न था कि ट्रेन के आने में कहीं और विलम्ब न हो जाए.
अपने को कोसता हुआ मैं स्टेशन के प्रतीक्षालय के भीतर आ गया. देख कर आश्चर्य हुआ कि इस छोटे से स्टेशन का प्रतीक्षालय बहुत साफ़-सुथरा था.
उस समय एक ही व्यक्ति थे जो किसी ट्रेन की प्रतीक्षा में वहां बैठे थे. देखने में वह बहुत बूढ़े लग रहे थे. वह एक कुर्सी पर चुपचाप, अपना सर झुकाए, बैठे थे. बिना कोई हलचल किये, वह ऐसे बैठे थे  की जैसे गहरी नींद में हों.   
मैं उनके सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया. उन्होंने मेरी ओर देखा भी नहीं, शायद उन्हें पता ही न चला था कि कोई भीतर आया है. मैंने उनकी नींद में विघ्न डालना उचित न समझा और एक किताब निकाल कर पढ़ने लगा.
कोई आधे-पौन घंटे के उपरान्त उन्होंने धीरे से अपना सर उठाया और मेरी ओर देखा. उनका चेहरा उदास और उनकी आँखें निष्प्राण लग रहीं थीं. वह एकटक मुझे देखते रहे. मैं हौले से मुस्कुराया परन्तु उन्होंने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त न की.
‘आपको देख कर लगता है कि आप सेना के एक अधिकारी हैं?’ उनकी वाणी भी निष्प्राण थी.
‘मैं सेना का अधिकारी था, पाँच वर्ष हो गए मुझे सेना छोड़े हुए.’
‘मेरा बेटा भी सेना में है, एक सिपाही है. बहुत ही जांबाज़ आदमी है.’ वह बिना किसी हाव-भाव के बात कर रहे थे.
किस रेजिमेंट में है?’
‘पांचवीं कुमाऊँ रेजिमेंट में, उसका नाम वीरसिंह है. इकहत्तर के युद्ध में वह युद्धबंदी बन गया......’
मेरे रोंगटे खड़े हो गए. वीरसिंह तो मेरी ही यूनिट में था, ‘वह तो मेरे ही यूनिट का सिपाही था. हम एक साथ युद्ध लड़े थे......पर वह लापता हो गया था.’  
‘वह तभी से ही युद्धबंदी है.’
‘आप को कैसे पता चला?’ मैं कह न पाया कि सेना के पास ऐसी कोई पक्की जानकारी न थी.
‘मेरे बचपन का एक मित्र पकिस्तान चला गया था. उसका बेटा वहां पुलिस में है. उसने किसी की मार्फत सूचना भिजवाई थी.’
‘यह सूचना आपने सरकार या सेना.....’
‘किसी ने कुछ नहीं किया. पर वीर रिहा हो रहा है. आज ही घर लौट रहा है.’ इतना कह वह अचानक बाहर चले गए.
मैं इस घटनाक्रम से इतना हतप्रभ हो गया था कि लम्बे समय तक चुपचाप वहीं बैठा रहा. इकहत्तर के युद्ध के कई चित्र आँखों के सामने तैरने लगे.
लगभग बारह बज रहे थे. मैं प्रतीक्षालय से बाहर आया. वीर के पिता कहीं दिखाई न दिए. मन में कई प्रश्न एक साथ उमड़ रहे थे. मैं सहायक स्टेशन मास्टर से मिला. जब उन्हें पता चला कि मैं सेना का एक सेवानिवृत्त अधिकारी हूँ तो मुझे अपने दफ्तर में ले गए.
‘अभी प्रतीक्षालय में एक व्यक्ति से भेंट हुई, उनका बेटा सेना में था. मेरी ही रेजिमेंट में था वह. पकिस्तान में युद्धबंदी है. उनके विषय में कुछ जानते हैं?’
स्टेशन मास्टर ने मुझे घूर कर देखा. मुझे लगा कि मैंने कोई आपत्तिजनक बात कह दी थी.
‘वह अभी आपसे मिले? समझ नहीं आता कि वह आपसे कैसे मिले.’
‘इस में न समझने वाली बात क्या है?’
‘यह सच है कि उनका बेटा युद्धबंदी है. वही कहते थे. कई वर्षों से हर शाम स्टेशन आ रहे थे, कहते थे, “वीर रिहा हो रहा है और रात की ट्रेन से घर लौट रहा है”. पिछले वर्ष जून तक ऐसा ही हुआ. फिर वह कभी नहीं आये.’
‘क्यों?’
‘पिछले जून में उनकी मृत्यु हो गयी थी, यहीं स्टेशन के इस प्रतीक्षालय के भीतर. उस दिन भी वह आये थे और देर रात तक बेटे की राह देखते रहे थे. कुर्सी पर बैठे-बैठे ही उन्होंने प्राण त्याग दिए थे. किसी की पता न चला था. सुबह कोई भीतर आया तो समझा कि वह बैठे-बैठे सो रहे हैं. पर वह सो नहीं रहे थे. उनकी मृत्यु हो चुकी थी.’
मैं समझ न पा रहा था कि स्टेशन मास्टर मुझे एक कहानी सुना रहे थे या कोई सत्य बता रहे थी. तभी मेरी ट्रेन प्लेटफार्म आ रुकी और गाड़ी पर सवार होने चल दिया.

©आइ बी अरोड़ा