Thursday, 25 January 2018

फिर हुई एक और दुर्घटना
कुछ दिन पहले की घटना है. हैदराबाद में एक बच्ची स्कूल बस से नीचे सड़क पर आ गिरी और बस के टायरों के नीचे आ कुचली गयी.
इस दुखद घटना पर अलग-अलग टीवी चैनलों पर गरमागरम बहस होना स्वाभाविक ही था. टीवी चर्चाएँ देखने से मैं बचने का पूरा प्रयास करता हूँ. मुझे आज तक यह बात समझ नहीं आई है कि टीवी चर्चाओं में जो लोग भाग लेते हैं वह अपने स्वभाव व संस्कारों के कारण चर्चाओं के दौरान असभ्य व्यवहार करते हैं या फिर यह टीवी कैमरे का जादू है जो शालीनता की सारी सीमायें लांगने पर उन्हें बाध्य करता है.
अपने प्रयास के बावजूद मैंने एक चर्चा कुछ समय तक देखी. चर्चा में भाग लेने वाले सभी लोग इस दुर्घटना के लिए व्यवस्था को दोष दे रहे थे, स्कूल प्रबंधन को दोषी मान रहे थे.
देश की व्यवस्था की जो स्थिती है हम सब भलीभांति जानते ही हैं. बच्चों को स्कूल पहुंचाने या स्कूल से घर लाने वाली बसें वगेरह कैसे चलती हैं वह भी हम जानते हैं. पर यह समस्या वहीं तक सीमित नहीं है.
मुझे लगता है की सड़क दुर्घटनाओं को लेकर हम सब जितने बेफिक्र हैं वह अपनेआप में बहुत ही गंभीर और डराने वाली बात है.
सड़क मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार 2016  में 150000 से अधिक लोग सड़क दुर्घटनाओं में मारे गये. उससे पहले वर्ष यह आंकड़ा 146000 से थोड़ा अधिक था. और चौंकाने वाली बात यह है कि लगभग 84% दुर्घटनाओं के लिए  वाहन चालक ज़िम्मेवार थे. अर्थात कोई 400000 दुर्घटनाएं हम सब की गलतियों के कारण घटीं. इतना ही नहीं, मरने वालों में लगभग 69% लोग 18 से 45 वर्ष की आयु-सीमा में थे.
इन आंकड़ों से साफ़ दिखता है की हमारे देश में उन वाहन चालकों की संख्या बहुत बड़ी है जो अपनी और दूसरों की सुरक्षा की चिंता रत्तीभर भी नहीं करते. ऐसी स्थिति में  व्यवस्था को दोषी ठहरा देना हम सब के लिए अनिवार्य हो जाता है, अन्यथा हमें अपनी भीतर भी झांकना पड़ सकता है.पर अगर कोई और दोषी है तो हमें क्या आत्म-चिंतन करना?
हर सुबह मैं बीसियों लोगों को अपने अपने वाहनों पर, बच्चों को साथ लिये, स्कूलों की ओर जाते देखता हूँ. इन में से अधिकतर लोग धड़ल्ले से ट्रैफिक नियमों की अवहेलना करते हुए अपने वाहन चलाते हैं. यह लोग न सिर्फ अपने बच्चों के जीवन को दावं पर लगाते हैं बल्कि अपने बच्चों को ऐसे संस्कार दे रहे हैं जिनके प्रभाव में आगे चल कर यह बच्चे अपनी और औरों की सुरक्षा को लेकर पूरी तरह लापरवाह रहेंगे.  

व्यवस्था कैसी भी हो, परन्तु  ट्रैफिक नियमों की अवहेलना करते हुए, अपनी और औरों की जान को खतरे में डाल कर हम अपनी विक्षिप्त मानसिकता का ही प्रदर्शन करते हैं. ऐसा मुझे लगता है.   

Saturday, 14 October 2017

मर गया क्या?

‘वो देख, एक बाइक उल्ट गयी....’
‘यह तो गया....’
‘मर गया क्या....’
‘लगता है....’
‘नहीं, मरा नहीं हैं,  घायल हुआ है....’
‘ऐसे कोई बस को ओवर-टेक करता है....’
गलती उसकी नहीं है. बस तो रुकी हुई थी. वह तो राईट साइड से ही आगे जा रहा था....’
‘ड्राईवर ने बस को एकदम राईट की ओर मोड़ दिया था....’
‘चले देखें....’
‘ज़्यादा चोट आई नहीं लगती....’
‘लगता है बाइक को ही नुक्सान हुआ है....’
‘अपनी बस आने वाली है. पहले ही बहुत लेट हो चुके हैं....’
‘कोई पुलिस को ही फोन कर दो...’
‘हिल-डुल रहा है....’
‘कुछ करना चाहिए....’
‘वहां भी एक-दो लोग खड़े हैं....’
‘वह तो बस फोटो ले रहे हैं....’
‘बस वाले बड़ी वाहियात ड्राइविंग करते हैं....’
‘हर दिन बीस-पचीस लोग इन बसों की चपेट में आ जाते हैं....’
‘हिल रहा है, ठीक ही होगा....’
‘पर अगर वह जल्दी ही एक ओर न हुआ तो आती-जाती कोई गाड़ी उसे रौंद डालेगी.....’
जो लोग यह संवाद बोले रहे थे वह सब एक बस-स्टॉप के निकट खड़े थे.
कुछ पल पहले ही, स्टॉप से थोड़ी दूर, एक बस आकर रुकी थी. सवारियां बस पर चढ़ने-उतरने लगीं थीं. उसी समय एक लड़का अपनी बाइक पर सवार, रूकी हुई बस की दायीं ओर से, बस को ओवर-टेक कर, आगे जाने लगा था. अचानक बस चल पड़ी थी.
बस के चलते ही ड्राईवर ने बस को तेज़ी से दायीं और घुमा दिया था. बस का पिछला भाग बाइक सवार से जा टकराया था. बाइक उल्ट गयी थी. बस-ड्राईवर ने रुक कर उस लड़के को देखना भी आवश्यक न समझा था.
स्टॉप पर खड़े कई लोगों ने यह दृश्य देखा था और देखते ही अपनी-अपनी भावनाएं और विचार व्यक्त करने लगे थे.
‘अरे-अरे, यह क्या हो गया....’
‘अब तो गया....’
‘हाँ, अब नहीं बच सकता....’
‘खत्म हो गया....’
‘ट्रक का टायर उसके सर के ऊपर से गुज़र गया था...’
‘सर कुचला गया....’
‘भयंकर....’
‘ट्रक तो सौ की स्पीड पर होगा....’

स्टॉप पर खड़े लोग तन्मयता से अपने-अपने विचार व्यक्त कर रह थे कि एक ट्रक तेज़ी से आया और सड़क पर गिरे युवक को रौंदता हुआ आगे बढ़ गया.

Tuesday, 10 October 2017

कोई सुधार न होगा

पिछले रविवार के दिन एक विश्वविध्यालय के चार विध्यार्थी एक सड़क दुर्घटना में मारे गए. दो अन्य युवक, जो उस गाड़ी में सवार थे, गंभीर अवस्था में हैं, अस्पताल में उनका ईलाज हो रहा है.
उन सब लड़कों की औसत आयु बीस के आसपास है. यह एक दुखदायी घटना है.
ध्यान देने वाली बात यह है कि सड़क दुर्घटनाओं में अधिकतर युवा लोग ही मरते हैं या घायल होते हैं.
एक रिपोर्ट के अनुसार 2015 में 1,20,626 पुरुषों की सड़क दुर्घटनाओं में जान गई थी. मरने वालों में 40% ऐसे पुरुष थे जिनकी आयु 21 से 34 वर्ष थी. लगभग 48,000 लोग, अपनी या औरों की लापरवाही के कारण, भरी जवानी में काल का ग्रास बन गए.
उन परिवारों के बारे में सोच कर भी दहशत होती है जिन परिवारों ने इतनी कम आयु के प्रियजनों को अकाल मृत्यु मरते देखा.
अगर हम 21 से 54 वर्ष की आयु के लोगों की बात करें तो यह आंकड़ा और भी चौंकाने वाला है. उस वर्ष (2015) में,  83,600 (अर्थात 70 %) पुरुष मारे गए जिनकी आयु 21 से 54 वर्ष थी. यह वह वर्ग है जो अपने परिवारों का लगभग सारा आर्थिक भार  अपने कंधों पर उठाता है. इन लोगों के अकाल मृत्यु से हज़ारों परिवार पूरी तरह बेसहारा हो गए होंगे.
जिन परिवारों के सदस्य सड़क दुर्घटनाओं में बुरी तरह घायल हो जाते हैं या अपाहिज हो जाते हैं उनकी स्थिति तो और भी दयनीय हो जाती है. जहां एक ओर आमदनी कम हो जाती या पूरी तरह समाप्त हो जाती वहां दूसरी ओर चिकित्सा पर खर्च सुरसा के मुख समान बढ़ता ही जाता है.
जिस गति से हमारी जन-संख्या बढ़ रही उससे कई गुना अधिक गति से सड़क पर होने वाली दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं. कई रिपोर्ट्स में यह बात सिद्ध हो चुकी है कि अधिकतर दुर्घटनाएं चालकों की गलती के कारण घट रही हैं. पर हम में से कोई भी इस समस्या को लेकर चिंतित नहीं है. इस कारण स्तिथि में शीघ्र ही कोई सुधार होगा ऐसी कल्पना करना भी गलत होगा.
पोस्ट-स्क्रिप्ट : देश में कितने लोग हैं जो स्वेच्छा से ट्रैफिक के नियमों का पूरी तरह पालन करते हैं? आपका क्या अनुमान है?
मेरे अनुमान के अनुसार बहुत कम लोग हैं जो ऐसा करते हैं. दिल्ली में अधिकतर सड़कों गाड़ी चलाने की गति-सीमा 50 किलोमीटर प्रति घंटा है. जब भी कभी कहीं पर रास्ता खाली मिलता है, मैं पचास की स्पीड पर अपनी कार चलाने का प्रयास करता हूँ. तब उस सड़क पर चलते लगभग सारे वाहन (तिपहिया समेत) तेज़ी से मेरी कार को पीछे छोड़ आगे निकल जाते हैं. यह सब नियमों की अवहेलना करते चलते हैं.


Thursday, 5 October 2017

सड़क हादसे और आर्थिक क्षति
नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार 2015 में अप्राकृतिक दुर्घटनाओं के कारण 3,36,051 लोग मारे गए और 4,98,195 लोग घायल हुए. सड़क दुर्घटनाएं इन हादसों का एक मुख्य कारण हैं. इसी रिपोर्ट के अनुसार उस वर्ष 1,77,423 लोग सड़क दुर्घटनाओं में मारे गए और 4,86,567 घायल हुए.
यह एक बहुत ही डराने वाला आंकड़ा है क्योंकि हर दिन लगभग 1800 लोग इन दुर्घटनाओं का शिकार हो रहे हैं. सड़कों पर अधिकतर हादसे वाहन चालकों की गलती के कारण ही होते हैं. हमारी ज़रा से सावधानी और संवेदना इन सड़क दुर्घटनाओं में कमी ला सकती है और हज़ारों परिवारों को बरबाद होने से बचा सकती है.
इन सड़क दुर्घटनाओं का एक दूसरा पहलु भी है जिस पर हम अधिक ध्यान नहीं देते हैं.
हर दुर्घटना का आर्थिक प्रभाव होता है जो न सिर्फ उन व्यक्तिओं और परिवारों को सहना पड़ता है जो दुर्घटनाओं का शिकार होते हैं परन्तु जिसका भार पूरे समाज को भी सहना पड़ता है.
एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में सड़क दुर्घटनाओं का आर्थिक प्रभाव(इकोनोमिक इम्पैक्ट) देश की जीडीपी का 3% है.
इस आर्थिक भार के मुख्य अंश है:
१.   चिकित्सा पर खर्च.
२.   कानूनी प्रक्रिया पर खर्च.
३.   वाहनों और सम्पति का नुक्सान.
४.   पीड़ित परिवारों की आमदनी का रुक जाना या घट जाना    
पिछले वर्ष भारत की जीडीपी थी लगभग 1,47,000 अरब रूपए. अतः सड़क दुर्घटनाओं के कारण कोई 4,41,000 करोड़ रूपए का भार देश को झेलना पडा था. यह कितना बड़ा आंकड़ा है इस बात का अनुमान आप इस तथ्य से लगा सकते हैं कि भारत सरकार ने 2016-17 में कुल 17 लाख करोड़ टैक्स इकट्ठा किया था. अर्थात देश में हुए सड़क हादसों का आर्थिक प्रभाव सरकार के टैक्स वसूली के 25% के बराबर था.
जिस देश में 3०% लोग गरीबी रेखा के नीचे हों वहां पर इतनी बड़ी आर्धिक क्षति एक विप्प्ती से कम नहीं है.  और अगर सिर्फ पिछले दस वर्षों में हुई दुर्घटनाओं की बात करें तो हम पायेंगे कि सड़क पर होने वाले हादसों का आर्धिक भार था 33,70,000 करोड़ रूपए.
हम सब को एक बात समझनी होगी कि लगभग 66% हादसे चालकों की गलती के कारण या फिर नशे की हालत में गाड़ी चलाने के कारण होते हैं. इन सब हादसों को टाला जा सकता है.
अगर हम सब यह निर्णय कर लें की हम सदा अपना वाहन सावधानी के साथ चलाएंगे तो हज़ारों लोग हादसों का शिकार होने से बच सकते हैं और देश को जो अरबों रुपये की आर्थिक क्षति झेलनी पड़ती है उसमें भी बहुत कटौती आ सकती है.   


Monday, 2 October 2017

एक रेलवे स्टेशन पर मची भगदड़

पिछले दिनों मुंबई में एक रेलवे स्टेशन पर मची भगदड़ में बाईस लोग मारे गए.
ऐसी दुखद घटनाएँ इस देश में अकसर घटती रहती हैं. कभी किसी मंदिर में दर्शन करने आये श्रदालूओं में भगदड़ मच जाती है और कभी किसी मेले या किसी राजनेता की रैली में भाग लेने आये लोगों में.
हर ऐसी घटना में बीसियों लोग मारे जाते हैं. टाइम्स ऑफ़ इंडिया में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार 2007 से 2016 के बीच देश के अलग-अलग भागों में  भगदड़ मचने की 27  घटनाएं घटीं जिनमें 968 लोगों की मृत्यु हुई. अर्थात औसतन हर वर्ष लगभग तीन घटनाएं घटीं और हर घटना में लगभग 35 लोग मारे गए.
हर बार सरकार (चाहे है वह कोई भी हो) चिंता व्यक्त करती है, जांच बैठाती है, मुआवज़े की घोषणा करती है. विपक्ष सरकार की आलोचना करता है, मंत्री के त्यागपत्र की मांग करता है. और बात वहीँ खत्म हो जाती.
इस बार भी ऐसा हुआ है. मीडिया में इस घटना को लेकर खूब चर्चा हुई है, विपक्ष ने अपना दाय्तिव निभाते हुए सरकार पार कड़े आरोप लगाएं हैं, सरकार ने मुआवज़े की घोषणा कर अपना कर्तव्य निभाया है.
पर हम सब, जो इन घटनाओं के चपेट में नहीं आते, तटस्थ से  बैठे रहते हैं क्योंकि कोई भी ऐसी दुर्घटना अब हमें झिंझोड़ती नहीं है.
हमारी इस तटस्थता का एक कारण है. अपनी और औरों की सुरक्षा को लेकर हम सब अधिक चिंतित नहीं होते, सुरक्षा को लेकर हमारी बेपरवाही विस्मयकारी ही है.
अगर आपको कभी किसी रेलवे स्टेशन पर रुकने का अवसर मिला है तो आपने लोगों को अकसर रेलवे ट्रैक पार करते हुए देखा होगा. मैंने तो कई बार लोगों को बीवी और बच्चों सहित रेल की पटरी पार करते देखा है. एक परिवार के साथ एक बूढ़ी महिला भी थी. आश्चर्य की बात नहीं कि हर दिन कई लोग रेल पटरियां पार करते हुए मारे जाते हैं.
रेलवे फाटक पर पाँच-दस मिनट रुकने के बजाये लोग अकसर फाटक के नीचे से अपने स्कूटर और बाइक निकाल ले जाते हैं. मुझे आज तक एक घटना नहीं भूलती. कई वर्ष हुए दिल्ली में शक्तिनगर के पास दो लड़के, जिन की आयु बीस के आसपास थी, अपनी बाइक फाटक के नीचे से निकाल रहे थे. उनकी बाइक रेल की पटरी पर रुक गई. जब तक वह उसे खींच कर पार ले जाते दोनों रेलगाड़ी के नीचे आ गए और कुचले गए. ऐसा हर दिन कहीं न कहीं होता ही रहता है.
हमारी अपनी सुरक्षा को लेकर लापरवाही की एक और मिसाल. जहां हमारा मन करता है वहीँ से हम सड़क पार कर लेते है. इस कारण हर दिन कई पैदल चलने वाले दुर्घटनाओं का शिकार होते हैं.
मेरा अपना अनुभव भी बहुत डराने वाला है. एक सुबह में कार से ऑफिस जा रहा था. अचानक आईएनए मार्किट के पास एक व्यक्ति रोड-डिवाइडर पर लगी रेलिंग (जो शायद चार  फुट ऊंची होगी) के ऊपर से कूद कर सीधा मेरी कार के सामने आ पहुंचा. मैंने अपनी कार कैसे रोकी यह मैं ही जानता हूँ. वह दाँत दिखाता हुआ सड़क पार निकल गया.
सड़कों पर हर दिन चार सौ से अधिक लोग सड़क दुर्घटनाओं  मारे जाते हैं. इनमें से 77% दुर्घटनाएं वाहन चालकों की गलती के कारण होती हैं. हम सब अगर सतर्कता से अपना-अपना वाहन चलायें तो हर दिन लगभग तीन सौ लोगों को  जीवनदान मिल सकता है.
पर किसे परवाह है औरों की सुरक्षा की? इस बेपरवाही के कारण सड़क दुर्घटनाओं में मरने और घायल होने वालों की संख्या में कोई कमी नहीं आ रही और न ही निकट भविष्य में आएगी.
अगर हम सब अपनी और औरों की सुरक्षा की प्रति थोडा सचेत हो जाएँ और  थोड़ा संयम का पालन करें तो कितने ही लोग काल का ग्रास बनने से बच जाएँ. और ऐसा करने में हमें कोई बोझ भी नहीं उठाना.
पर सत्य तो यह है कि इस देश में हम सब अपने जीवन का बहुत ही तुच्छ मूल्य लगाते हैं. ऐसी स्तिथि में हम कैसे अपेक्षा कर सकते हैं कि सरकारें हमारे जीवन को कोई अधिक महत्व देंगी.
हमें यह भी समझना होगा कि जिस सरकार की हम आलोचना करते हैं उसका सारा तन्त्र भी तो हम-आप ही चलाते है. कितने ऐसे कर्मचारी हैं जो पूरी निष्ठा और लग्न से अपनी जिम्मेवारी निभाते हैं. मैंने तो ऐसे लोग भी देखें हैं जिन्होंने वर्षों तक ऑफिस में कलम को हाथ नहीं लगाया. हम इस बात को कितना भी नकारें पर हम स्वयं ही मुंबई जैसी दुर्घटनाओं का कारण हैं.
जब तक हम सब दूसरों के प्रति उदासीन व तटस्थ रहेंगे ऐसी दुर्घटनाएं घटती रहेंगे.

    

Saturday, 30 September 2017

राजनीति और परिवारवाद
अपनी पुस्तक ‘विटनेस टू एन इरअ’ (Witness to an Era: India 1920 to the Present Day)  में फ्रैंक मोरेस (Frank Moraes) ने पंडित जवाहर लाल नेहरु की तुलना एक वट वृक्ष से की है. लेखक के अनुसार महात्मा गाँधी के नेतृत्व में कई नेताओं को पनपने का अवसर मिला. नेहरु, सरदार पटेल, मौलाना आज़ाद, डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद जैसे कई लोग देश के अग्रणी राजनेता बने.
परन्तु फ्रैंक मोरेस के अनुसार नेहरु जी एक वट वृक्ष सामान थे. वट वृक्ष ऐसा वृक्ष होता है जिस की छाँव में एक तिनका भी नहीं उग पाता. नेहरु भी ऐसे ही नेता थे. उनकी अगुआई में कोई नेता उबर कर आगे न आ पाया.
अगर हम नेहरु जी की तुलना अमरिका के प्रथम राष्ट्रपति जार्ज वाशिंगटन से करें तो पायेंगे कि जार्ज वाशिंगटन ने इस बात का पूरा ध्यान रखा कि अपने कार्यकाल में वह कोई भी ऐसी प्रथा न स्थापित करें जिससे उस देश में राजशाही का चलन शुरू हो जाए. दो बार चुनाव जितने के बाद जार्ज वाशिंगटन ने यह निर्णय ले लिया कि वह तीसरी बार चुनाव में खड़े ही न होंगे. जार्ज वाशिंगटन के इस निर्णय का अनुकरण करते हुए लगभग एक सौ पचास वर्षों तक कोई भी नेता तीसरी बार चुनाव न लड़ा.
यहाँ इस देश में नेहरु जी तब तक ‘सिंहासन’ पर बैठे रहे जब तक की उनकी मृत्यु न हो गयी.
राजपरिवारों के पनपने की बीज नेहरु काल में बो दिए गए थे. नेहरूजी ने शुरू से ही इंदिरा गांधी के अपने साथ रखा था. इंदिरा गांधी उनकी अनाधिकारिक पर्सनल असिस्टेंट थी. उनके जीवन काल में ही इंदिरा गांधी पहले कांग्रेस वर्किंग समिति की सदस्य बनी, फिर पार्टी अध्यक्ष. संकेत स्पष्ट था. परिवारवाद का बीज बो दिया गया था.
आज यह स्तिथि है कि, कुछ एक नेताओं को छोड़, हर किसी नेता का लक्ष्य होता है कि राजनीती में रहते ही अपने बेटे, बेटी, बहु, नाती, रिश्तेदार को राजनीति में स्थापित कर दिया जाए. यह इच्छा हर एक नेता में पनपती है, वह केंद्र सरकार के मंत्री हो या पंचायत का सदस्य.
क्या कारण है कि भारतीय राजनीति में परिवारवाद इस तरह पनप रहा है?
इस का मूल कारण है हमारी सोच. हर राजनेता, चाहे वह विलायत से ही पढ़कर (?) आया हो या अमरीका से, यह समझता है कि जिस भी पद पर वह विराजमान है, वह पद उसे किसी अपने को ही विरासत में दे कर जाना है. जब तक वह राजनीति में रहता अपना ध्येय वह कभी भूलता नहीं और उसका हर कदम अपने इस लक्ष्य की ओर ही जाता है.
दूसरा कारण, सिर्फ राजनीति ही एक ऐसा व्यवसाय है जिस में प्रवेश पाने के लिए प्रार्थी के पास किसी योग्यता का होना अनिवार्य नहीं है. आप अपने आसपास ही देख लें. कितने ऐसे ‘युवराज’ हैं जो आई आई टी की, सिविल सर्विसेज की, पीएमटी या सीपीएमटी की परीक्षा पास कर पाते. शायद यह ‘युवराज’ क्लर्क ग्रेड परीक्षा में भी असफल रहते. पर विरासत में तो सब कुछ मिल जाता है, मंत्री का पद, लोक सभा/ विधान सभा की सदस्यता.
तीसरी कारण, अगर कोई व्यक्ति सरकारी विभाग में चपरासी भी बनना चाहता है तो उसका चाल-चलन अच्छा होना चाहिए, पुलिस में उसका रिकॉर्ड साफ़ होना चाहिए. लेकिन राजनीति में तो वह लोग भी प्रवेश पा लेते हैं जिन के विरुद्ध हत्या या बलात्कार के मामले दर्ज हों. अत: किसी ‘युवराज’ को अपने बालपन या युवाकाल में अपने  चाल-चलन की चिंता नहीं करनी पड़ती, गद्दी तो एक दिन विरासत उसे मिल ही जानी है.
हमारे राजनेता किसी का विश्वास नहीं करते, किसी पर उन्हें भरोसा नहीं होता. इस कारण सत्ता में बने रहने के लिए वह सिर्फ अपने सगे-संबंधियों पर ही निर्भर रहते हैं. अगर एक राजनेता के दृष्टिकोण से सोचा जाए तो यह सही भी है. अगर (कंस समान) बेटा बाप को कैद में डाल सकता है तो बाहरी लोगों पर कैसे कोई भरोसा कर ले?
और सबसे महत्वपूर्ण कारण, जितनी सुविधाएं और विशेषाधिकार हमारे देश में एक राजनेता को मिलते हैं उतनी सुविधाएं और विशेषाधिकार शायद राजशाही में राजाओं और राजकुमारों को भी नहीं मिलते. इस देश में कौन ऐसा व्यवसाय है जिसमें प्रवेश पाकार आप उस आन बान से रह सकते हैं जितनी आन बान से हमारे राजनेता रहते हैं?
ऐसा कौन माता-पिता होंगे जो यह न चाहेंगे कि उनके पुत्र-पुत्रियाँ व अन्य सगे-संबंधी भी वही सुख-सुविधाएं भोगें जो वह स्वयं अपने राजनीतिक जीवन में भोगते आयें हैं. सत्ता का नशा किसे अच्छा नहीं लगता. शायद हेनरी किसिंजर ने कहा था, पॉवर इस ध अल्टीमेट ऐफ़्राडिज़िऐक (Power is the ultimate aphrodisiac). हमारे राजनेता और हमारी राजनीति इस बात का जीता जागता प्रमाण है.
परिवारवाद के समर्थक कोई भी तर्क देलें परन्तु सत्य तो यही है कि हर राजनेता किसी न किसी रूप में पुत्र-मोह से ग्रसित ध्रतराष्ट्र ही है.

        

Thursday, 28 September 2017

क्या यह आतंकवाद नहीं है?

कोई पचासेक वर्षों से हम इस देश किसी न किसी तरह के आतंकवाद को झेल रहे हैं. आतंकवाद की कुछ घटनाएं तो इतनी भयावह थीं कि उन घटनाओं को हम शायद कभी भुला भी न पायें.
इन्टरनेट पर बहुत खोज करने के बाद भी मैं आतंकवादी घटनाओं में मारे गए लोगों की कोई अधिकृत संख्या जान न पाया. विकिपीडिया में दी गई जानकारी के अनुसार पिछले दस वर्षों (2006 से 2015 तक) में घटी घटनाओं में 5789 लोग मारे गए और 10331 लोग घायल हुए. ज्यूइश वर्चुअल लाइब्रेरी की साईट पर दी गई जानकारी के अनुसार 2012 से 2016 के बीच 1680 लोग मारे गए और 3059 घायल हुए.
स्वाभाविक है कि आतंक को लेकर हम सब चिंतित है. मीडिया में इस विषय पर लगातार चर्चा होती रहती है. सरकार ने आतंकवाद से झूझने के लिए कई कदम उठाये हैं और इस सारे बंदोबस्त पर करोड़ों (शायद अरबों?) रूपए खर्च कर दिए हैं. जनता, मीडिया, विपक्ष सब सरकार के जवाबदेही चाहते हैं और यह भी अपेक्षा करते हैं कि आतंकवाद से निपटने के लिए और कारगर कदम उठाये जाएँ.
पर एक अन्य प्रकार के आतंक से यह देश बरसों से  पीड़ित हैं पर उसको लेकर हम सब पूरी तरह बेपरवाह और निश्चिन्त हैं.    
उस आतंक की गंभीरता को समझने के लिए कुछ आंकड़ों को जान लेना आवयश्क है.
जहां एक ओर पिछले दस वर्षों में अलग-अलग आतंकवादी घटनों के कारण अगर पाँच से छह हज़ार लोग मारे गए हैं और दस हज़ार के आसपास घायल हुए हैं तो वहीं दूसरी ओर उसी कालावधी में इस अलग प्रकार के आतंक के कारण 13,04,345 लोग मारे गए और पचास लाख से अधिक लोग घायल हुए. यह आतंक है सड़क पर घटने वाली दुर्घटनाएं.
पर आश्चर्य है कि हम सब ने इस आतंक को कितने सहज भाव से स्वीकार कर लिया. न इस पर मीडिया में चर्चा होती है, न विपक्ष के लिए यह एक मुद्दा है.
आतंकवादी की गोली से आहत एक व्यक्ति की मृत्यु पूरे देश को हिला कर रख देती है.  पर सड़क दुर्घटनाओं के कारण हर दिन चार सौ से अधिक लोग मारे जाते हैं, पर हमारे लिए यह मौतें कोई मायने नहीं रखती. दुर्घटना में मरने वाले किसी जानकार की अर्थी को कन्धा दे कर हम कर्तव्य-मुक्त हो जाते हैं.
क्या इस बेपरवाही का कारण यह तो नहीं है कि हम सब इन मौतों के लिए जिम्मेवार हैं, हम सब यह सच्चाई  भीतर से जानते हैं और इसी कारण इसे कोई मुद्दा नहीं बनाना चाहते.
यह बात मैं इस लिए कह रहा हूँ क्योंकि आंकड़ों के अनुसार 77% सड़क दुर्घटनायें वाहन चालकों की गलती के कारण होती हैं. अर्धात इस देश में हर दिन तीन सौ से अधिक लोग वाहन चालकों की गलती के कारण अपनी जान गंवाते हैं. इन तीन सौ मौतों में से दो सौ से अधिक मौतें उन वाहन चालकों के कारण होती हैं जो या तो अपना वाहन तेज़ गति से चलाते हैं या फिर नशे की हालत में अपनी गाड़ी चलाते हैं. आपको याद दिला दूं कि 1993 के मुंबई बम धमाकों में लगभग 300 लोग ही मारे गए थे.
एक आतंकवादी किसी मॉल या मार्किट में आकर अंधाधुंध गोलियां चलाता है या वहां बम-विस्फोट करता है, कुछ लोग घायल होते हैं या मारे जाते हैं. हम हर दिन सड़कों पर अंधाधुंध अपनी गाड़ियाँ दौड़ाते हैं, तेरह सौ से अधिक दुर्घटनाएं करते हैं,  हर दिन तीन सौ से अधिक लोगों को मार गिराते हैं, एक हज़ार से अधिक लोगों को घायल कर देते है. क्या यह एक प्रकार का आतंकवाद नहीं है? यह भी बताना उचित होगा कि कुछ आतंकवादियों की भांति कुछ वाहन चालक इन हादसों में मारे जाते हैं.
अगर वाहन चालकों की गलती के कारण तीन सौ से अधिक लोग हर दिन मर रहे हैं तो हम सड़क दुर्घटनाओं को बहस का मुद्दा कैसे बना सकते हैं. और अगर हम इसे बहस का मुद्दा बनायेंगे तो क्या हम स्वयं को ही कटघरे में खड़ा नहीं पायेंगे?
आप कहेंगे कि यह सिस्टम की गलती है जो ऐसे लोगों को लाइसेंस दे देता है जो अयोग्य हैं; ट्रैफिक पुलिस अपना काम ठीक से नहीं करती; नियम-कानून में खामियां है.
यह सब सही है, लेकिन  हम सब यह बात क्यों नहीं समझते कि लापरवाही से गाड़ी चलाने के कारण हम दूसरों के लिए एक खतरा तो बनते ही हैं, हम अपनी जान को भी तो जोखिम में डाल देते हैं.
गाड़ी का स्टीयरिंग व्हील हाथ में पकड़ते ही हम इतने विवेकहीन कैसे हो जाते हैं यह बात मैं आज तक नहीं समझ पाया.