Saturday, 17 March 2018


संसद में गतिरोध
संसद में पिछले कई दिनों से गतिरोध चल रहा है. इस कारण बजट भी शोर-शराबे के बीच, बिना किसी चर्चा के, पास कर दिया गया. कई महत्वपूर्ण बिल अटके हुए हैं. कई गम्भीर समस्याएं देश के सामने हैं पर लगता नहीं कि इन बातों की किसी दल या सांसद को ख़ास चिंता है.
क्या कारण है कि संसद की कार्यवाही वैसे नहीं चलती जैसे चलनी चाहिए?
मेरी समझ में इसके कई कारण हैं.
पहला कारण है राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र की कमी. लगभग सभी दल किसी परिवार या व्यक्ति विशेष के नियन्त्रण में हैं. वह परिवार या व्यक्ति एक निरंकुश शासक की भांति अपने दल को अपने वश में रखता है. एक राजा या ज़मींदार की तरह ही “शासक” अपना उतराधिकारी तय करता है. उसके हर निर्णय को सब सदस्य बड़े विनम्र भाव से स्वीकार कर लेते हैं. सब पूरी आस्था के साथ इस व्यस्था का पालन करते हैं. ऐसे दलों के सदस्यों की संसदीय प्रणाली में कितनी आस्था होगी इसकी कल्पना की जा सकती है.
अगर आप ने कभी ससंद की कार्यवाही का सीधा प्रसारण देखा होगा तो आपने पाया होगा कि जब किसी विषय पर चर्चा हो भी रही होती है तो अकसर सदन में चालीस-पचास सांसदों से अधिक सदस्य उपस्थित नहीं होती. कई बार तो इससे भी कम उपस्थिति होती है.
किसी मुद्दे पर चर्चा करने के लिए एक व्यक्ति को थोड़ी-बहुत मेहनत करनी पड़ती है. तथ्यों को जानना पड़ता है, समझना पड़ता है. तर्क देने पड़ते है. और दूसरों की बात को सुनना पड़ता है.
लेकिन हो-हल्ला करना सरल है. नारेबाज़ी करना आसान है. संसद में गतिरोध का एक कारण यही भी है.
फिर टीवी भी नारेबाजी और हो-हल्ले को अधिक महत्व देता है. किसी सांसद के भाषण को, चाहे वह कितना ही दिलचस्प और प्रबुद्ध क्यों न हो, कौन टीवी चैनल दिखाता है? उस भाषण पर कितनी चर्चा होती है? आजकल तो ट्विटर पर दिए गए किसी नेता के सन्देश की जितनी चर्चा होती उतनी चर्चा तो सदन की पुरे दिन की कार्यवाही को नहीं होती.
छोटे दलों की अपनी अलग से भूमिका है. उनका ध्येय अपने दल तक ही सीमित होता है. अगर राष्ट्रीय दल, देश के हितों की अनदेखी, कर सदन की कार्यवाही में गतिरोध पैदा करते हैं हैं तो छोटे/क्षेत्रीय दलों से को अलग अपेक्षा करना गलत होगा.
और एक बात संसद में ऐसे कई सदस्य हैं जिनके विरुद्ध अपराधिक मामले हैं चल रहे है. ऐसे महानुभावों से किस प्रकार की अपेक्षा की जा सकती है? इन लोगों की संसदीय प्रणाली में कितनी और कैसी आस्था होगी यह सोचने की बात है.
संसद का सबसे महत्वपूर्ण कार्य होता है सरकार पर निगरानी रखना. वह तभी  सम्भव है जब सदन की कार्यवाही नियमों अनुसार चले. प्रश्नकाल में तीखे प्रश्न पूछे जाएँ, मुद्दों पर चर्चा हो, सरकार की गलतियों और विफलताओं को उजागर किया जाए.
ऐसे में हर सरकार मन ही मन यह चाहेगी कि संसद की कार्यवाही जितने समय तक बाधित रह सकती है बाधित रहे. अत: विपक्ष सदन में गतिरोध पैदा कर, सरकार की मन चाही  इच्छा पूरी कर देता है.
कई बार तो लगता है कहीं विपक्ष और सरकार आपस में सांठ-गांठ तो नहीं? आज एक दल राज करेगा और विपक्ष सरकार पर पैनी नज़र रखने के बजाये सदन में हो-हल्ला करता रहेगा, कल अगर विपक्षी दल सत्ता में आया तो उन्हें भी वैसे निरंकुश सरकार चलाने का अवसर दिया जायेगा?    


Monday, 12 March 2018


दो छात्रों की मौत
दिल्ली में कल फिर दो छात्र सड़क हादसे में अपनी जान गवां बैठे.
रिपोर्ट के अनुसार, शराब के नशे में, वह तेज़ गति से अपनी कार चला रहे थे कि कार डिवाइडर को पार कर बिजली के   एक खम्भे से जा टकराई. इस समाचार को लाखों लोगों ने पढ़ा होगा.  हज़ारों लोगों ने टीवी पर देखा होगा. पर शायद ही किसी के मन पर खरोंच भी पड़ी होगी, शायद ही किसी के माथे पर शिकन उभरी होगी.
जो लोग उन युवकों के अंतिम संस्कार में भाग लेने गए होंगे  वह सब भी इस घटना को बड़ी सरलता से भुला कर धड़ल्ले से अपने-अपने वाहन चलाते हुए घरों को चल दिए होंगे.
जिस देश में हर घंटे में लगभग बीस लोग अपनी जान सड़क दुर्घटनाओं में गवां देतें हैं वहां कौन किस की मृत्यु को लेकर व्यथित हो?
यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि 80% से भी अधिक दुर्घटनाएं वाहन-चालकों की गलती के कारण होती हैं. अर्थात हम सब जानते हैं कि अधिकतर दुर्घटनाएं हमारी अपनी लापरवाही के कारण ही हो रही हैं, बस हम सब सिर्फ अंजान  बनने का नाटक कर रहे हैं.
सत्य तो यही है कि हम वाहन चालक अगर सड़क पर अपना वाहन चलाते समय थोड़ी सी सावधानी बरतने लगें तो हर वर्ष हज़ारों लोग अकाल मृत्यु से बच सकते हैं, हज़ारों परिवार उजड़ने से बच सकते हैं.
हर सुबह में बीसियों लोगों को देखता हूँ जो अपने बच्चों को स्कूल छोड़ने जाते हैं. उन में से कई लोग सड़क नियमों की अवहेलना करते हुए अपने वाहन चलाते हैं. देखने में यह सब लोग मध्य या उच्च-मध्य वर्गों के पढ़े-लिखे लोग लगते हैं. अपने बच्चों को शिक्षित करने के लिए हर माह हज़ारों रूपए खर्च करते हैं. पर उन्हें इस बात की तनिक भी चिंता नहीं होती कि ट्रैफिक नियमों का उल्लघंन कर वह कैसे संस्कार अपने बच्चों को दे रहे हैं.
जो बच्चा आज अपनी माँ या अपने पिता को ऐसे गाड़ी चलाते देखता है कल वही अपनी कार को 130 की स्पीड पर दौड़ाता और किसी सड़क दुर्घटना का शिकार होता है. 
बचपन से सुनते आये हैं कि ‘जाको राखे साईयाँ मार सके ना कोए’. यह कथन कितना सत्य है इस बात का अहसास मुझे अपने देश की सड़कों पर अपना वाहन चलाते हुए अकसर होता है. सड़क पर आप सुरक्षित हैं तो ईश्वर की अनुकम्पा  कारण, अन्यथा आपकी सुरक्षा की फ़िक्र करने वाला कोई विरला वाहन-चालाक ही मिलता है.
देश में सड़क दुर्घटनाओं में कोई कमी निकट भविष्य में आएगी? अपने आस-पास लोगों को देख कर ऐसा लगता तो नहीं, अतः ऐसी दुखद दुर्घटनाओं की सूचनाएं हमें बार-बार सुननी और पढ़नी पड़ेंगी.

Thursday, 25 January 2018

फिर हुई एक और दुर्घटना
कुछ दिन पहले की घटना है. हैदराबाद में एक बच्ची स्कूल बस से नीचे सड़क पर आ गिरी और बस के टायरों के नीचे आ कुचली गयी.
इस दुखद घटना पर अलग-अलग टीवी चैनलों पर गरमागरम बहस होना स्वाभाविक ही था. टीवी चर्चाएँ देखने से मैं बचने का पूरा प्रयास करता हूँ. मुझे आज तक यह बात समझ नहीं आई है कि टीवी चर्चाओं में जो लोग भाग लेते हैं वह अपने स्वभाव व संस्कारों के कारण चर्चाओं के दौरान असभ्य व्यवहार करते हैं या फिर यह टीवी कैमरे का जादू है जो शालीनता की सारी सीमायें लांगने पर उन्हें बाध्य करता है.
अपने प्रयास के बावजूद मैंने एक चर्चा कुछ समय तक देखी. चर्चा में भाग लेने वाले सभी लोग इस दुर्घटना के लिए व्यवस्था को दोष दे रहे थे, स्कूल प्रबंधन को दोषी मान रहे थे.
देश की व्यवस्था की जो स्थिती है हम सब भलीभांति जानते ही हैं. बच्चों को स्कूल पहुंचाने या स्कूल से घर लाने वाली बसें वगेरह कैसे चलती हैं वह भी हम जानते हैं. पर यह समस्या वहीं तक सीमित नहीं है.
मुझे लगता है की सड़क दुर्घटनाओं को लेकर हम सब जितने बेफिक्र हैं वह अपनेआप में बहुत ही गंभीर और डराने वाली बात है.
सड़क मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार 2016  में 150000 से अधिक लोग सड़क दुर्घटनाओं में मारे गये. उससे पहले वर्ष यह आंकड़ा 146000 से थोड़ा अधिक था. और चौंकाने वाली बात यह है कि लगभग 84% दुर्घटनाओं के लिए  वाहन चालक ज़िम्मेवार थे. अर्थात कोई 400000 दुर्घटनाएं हम सब की गलतियों के कारण घटीं. इतना ही नहीं, मरने वालों में लगभग 69% लोग 18 से 45 वर्ष की आयु-सीमा में थे.
इन आंकड़ों से साफ़ दिखता है की हमारे देश में उन वाहन चालकों की संख्या बहुत बड़ी है जो अपनी और दूसरों की सुरक्षा की चिंता रत्तीभर भी नहीं करते. ऐसी स्थिति में  व्यवस्था को दोषी ठहरा देना हम सब के लिए अनिवार्य हो जाता है, अन्यथा हमें अपनी भीतर भी झांकना पड़ सकता है.पर अगर कोई और दोषी है तो हमें क्या आत्म-चिंतन करना?
हर सुबह मैं बीसियों लोगों को अपने अपने वाहनों पर, बच्चों को साथ लिये, स्कूलों की ओर जाते देखता हूँ. इन में से अधिकतर लोग धड़ल्ले से ट्रैफिक नियमों की अवहेलना करते हुए अपने वाहन चलाते हैं. यह लोग न सिर्फ अपने बच्चों के जीवन को दावं पर लगाते हैं बल्कि अपने बच्चों को ऐसे संस्कार दे रहे हैं जिनके प्रभाव में आगे चल कर यह बच्चे अपनी और औरों की सुरक्षा को लेकर पूरी तरह लापरवाह रहेंगे.  

व्यवस्था कैसी भी हो, परन्तु  ट्रैफिक नियमों की अवहेलना करते हुए, अपनी और औरों की जान को खतरे में डाल कर हम अपनी विक्षिप्त मानसिकता का ही प्रदर्शन करते हैं. ऐसा मुझे लगता है.   

Saturday, 14 October 2017

मर गया क्या?

‘वो देख, एक बाइक उल्ट गयी....’
‘यह तो गया....’
‘मर गया क्या....’
‘लगता है....’
‘नहीं, मरा नहीं हैं,  घायल हुआ है....’
‘ऐसे कोई बस को ओवर-टेक करता है....’
गलती उसकी नहीं है. बस तो रुकी हुई थी. वह तो राईट साइड से ही आगे जा रहा था....’
‘ड्राईवर ने बस को एकदम राईट की ओर मोड़ दिया था....’
‘चले देखें....’
‘ज़्यादा चोट आई नहीं लगती....’
‘लगता है बाइक को ही नुक्सान हुआ है....’
‘अपनी बस आने वाली है. पहले ही बहुत लेट हो चुके हैं....’
‘कोई पुलिस को ही फोन कर दो...’
‘हिल-डुल रहा है....’
‘कुछ करना चाहिए....’
‘वहां भी एक-दो लोग खड़े हैं....’
‘वह तो बस फोटो ले रहे हैं....’
‘बस वाले बड़ी वाहियात ड्राइविंग करते हैं....’
‘हर दिन बीस-पचीस लोग इन बसों की चपेट में आ जाते हैं....’
‘हिल रहा है, ठीक ही होगा....’
‘पर अगर वह जल्दी ही एक ओर न हुआ तो आती-जाती कोई गाड़ी उसे रौंद डालेगी.....’
जो लोग यह संवाद बोले रहे थे वह सब एक बस-स्टॉप के निकट खड़े थे.
कुछ पल पहले ही, स्टॉप से थोड़ी दूर, एक बस आकर रुकी थी. सवारियां बस पर चढ़ने-उतरने लगीं थीं. उसी समय एक लड़का अपनी बाइक पर सवार, रूकी हुई बस की दायीं ओर से, बस को ओवर-टेक कर, आगे जाने लगा था. अचानक बस चल पड़ी थी.
बस के चलते ही ड्राईवर ने बस को तेज़ी से दायीं और घुमा दिया था. बस का पिछला भाग बाइक सवार से जा टकराया था. बाइक उल्ट गयी थी. बस-ड्राईवर ने रुक कर उस लड़के को देखना भी आवश्यक न समझा था.
स्टॉप पर खड़े कई लोगों ने यह दृश्य देखा था और देखते ही अपनी-अपनी भावनाएं और विचार व्यक्त करने लगे थे.
‘अरे-अरे, यह क्या हो गया....’
‘अब तो गया....’
‘हाँ, अब नहीं बच सकता....’
‘खत्म हो गया....’
‘ट्रक का टायर उसके सर के ऊपर से गुज़र गया था...’
‘सर कुचला गया....’
‘भयंकर....’
‘ट्रक तो सौ की स्पीड पर होगा....’

स्टॉप पर खड़े लोग तन्मयता से अपने-अपने विचार व्यक्त कर रह थे कि एक ट्रक तेज़ी से आया और सड़क पर गिरे युवक को रौंदता हुआ आगे बढ़ गया.

Tuesday, 10 October 2017

कोई सुधार न होगा

पिछले रविवार के दिन एक विश्वविध्यालय के चार विध्यार्थी एक सड़क दुर्घटना में मारे गए. दो अन्य युवक, जो उस गाड़ी में सवार थे, गंभीर अवस्था में हैं, अस्पताल में उनका ईलाज हो रहा है.
उन सब लड़कों की औसत आयु बीस के आसपास है. यह एक दुखदायी घटना है.
ध्यान देने वाली बात यह है कि सड़क दुर्घटनाओं में अधिकतर युवा लोग ही मरते हैं या घायल होते हैं.
एक रिपोर्ट के अनुसार 2015 में 1,20,626 पुरुषों की सड़क दुर्घटनाओं में जान गई थी. मरने वालों में 40% ऐसे पुरुष थे जिनकी आयु 21 से 34 वर्ष थी. लगभग 48,000 लोग, अपनी या औरों की लापरवाही के कारण, भरी जवानी में काल का ग्रास बन गए.
उन परिवारों के बारे में सोच कर भी दहशत होती है जिन परिवारों ने इतनी कम आयु के प्रियजनों को अकाल मृत्यु मरते देखा.
अगर हम 21 से 54 वर्ष की आयु के लोगों की बात करें तो यह आंकड़ा और भी चौंकाने वाला है. उस वर्ष (2015) में,  83,600 (अर्थात 70 %) पुरुष मारे गए जिनकी आयु 21 से 54 वर्ष थी. यह वह वर्ग है जो अपने परिवारों का लगभग सारा आर्थिक भार  अपने कंधों पर उठाता है. इन लोगों के अकाल मृत्यु से हज़ारों परिवार पूरी तरह बेसहारा हो गए होंगे.
जिन परिवारों के सदस्य सड़क दुर्घटनाओं में बुरी तरह घायल हो जाते हैं या अपाहिज हो जाते हैं उनकी स्थिति तो और भी दयनीय हो जाती है. जहां एक ओर आमदनी कम हो जाती या पूरी तरह समाप्त हो जाती वहां दूसरी ओर चिकित्सा पर खर्च सुरसा के मुख समान बढ़ता ही जाता है.
जिस गति से हमारी जन-संख्या बढ़ रही उससे कई गुना अधिक गति से सड़क पर होने वाली दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं. कई रिपोर्ट्स में यह बात सिद्ध हो चुकी है कि अधिकतर दुर्घटनाएं चालकों की गलती के कारण घट रही हैं. पर हम में से कोई भी इस समस्या को लेकर चिंतित नहीं है. इस कारण स्तिथि में शीघ्र ही कोई सुधार होगा ऐसी कल्पना करना भी गलत होगा.
पोस्ट-स्क्रिप्ट : देश में कितने लोग हैं जो स्वेच्छा से ट्रैफिक के नियमों का पूरी तरह पालन करते हैं? आपका क्या अनुमान है?
मेरे अनुमान के अनुसार बहुत कम लोग हैं जो ऐसा करते हैं. दिल्ली में अधिकतर सड़कों गाड़ी चलाने की गति-सीमा 50 किलोमीटर प्रति घंटा है. जब भी कभी कहीं पर रास्ता खाली मिलता है, मैं पचास की स्पीड पर अपनी कार चलाने का प्रयास करता हूँ. तब उस सड़क पर चलते लगभग सारे वाहन (तिपहिया समेत) तेज़ी से मेरी कार को पीछे छोड़ आगे निकल जाते हैं. यह सब नियमों की अवहेलना करते चलते हैं.


Thursday, 5 October 2017

सड़क हादसे और आर्थिक क्षति
नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार 2015 में अप्राकृतिक दुर्घटनाओं के कारण 3,36,051 लोग मारे गए और 4,98,195 लोग घायल हुए. सड़क दुर्घटनाएं इन हादसों का एक मुख्य कारण हैं. इसी रिपोर्ट के अनुसार उस वर्ष 1,77,423 लोग सड़क दुर्घटनाओं में मारे गए और 4,86,567 घायल हुए.
यह एक बहुत ही डराने वाला आंकड़ा है क्योंकि हर दिन लगभग 1800 लोग इन दुर्घटनाओं का शिकार हो रहे हैं. सड़कों पर अधिकतर हादसे वाहन चालकों की गलती के कारण ही होते हैं. हमारी ज़रा से सावधानी और संवेदना इन सड़क दुर्घटनाओं में कमी ला सकती है और हज़ारों परिवारों को बरबाद होने से बचा सकती है.
इन सड़क दुर्घटनाओं का एक दूसरा पहलु भी है जिस पर हम अधिक ध्यान नहीं देते हैं.
हर दुर्घटना का आर्थिक प्रभाव होता है जो न सिर्फ उन व्यक्तिओं और परिवारों को सहना पड़ता है जो दुर्घटनाओं का शिकार होते हैं परन्तु जिसका भार पूरे समाज को भी सहना पड़ता है.
एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में सड़क दुर्घटनाओं का आर्थिक प्रभाव(इकोनोमिक इम्पैक्ट) देश की जीडीपी का 3% है.
इस आर्थिक भार के मुख्य अंश है:
१.   चिकित्सा पर खर्च.
२.   कानूनी प्रक्रिया पर खर्च.
३.   वाहनों और सम्पति का नुक्सान.
४.   पीड़ित परिवारों की आमदनी का रुक जाना या घट जाना    
पिछले वर्ष भारत की जीडीपी थी लगभग 1,47,000 अरब रूपए. अतः सड़क दुर्घटनाओं के कारण कोई 4,41,000 करोड़ रूपए का भार देश को झेलना पडा था. यह कितना बड़ा आंकड़ा है इस बात का अनुमान आप इस तथ्य से लगा सकते हैं कि भारत सरकार ने 2016-17 में कुल 17 लाख करोड़ टैक्स इकट्ठा किया था. अर्थात देश में हुए सड़क हादसों का आर्थिक प्रभाव सरकार के टैक्स वसूली के 25% के बराबर था.
जिस देश में 3०% लोग गरीबी रेखा के नीचे हों वहां पर इतनी बड़ी आर्धिक क्षति एक विप्प्ती से कम नहीं है.  और अगर सिर्फ पिछले दस वर्षों में हुई दुर्घटनाओं की बात करें तो हम पायेंगे कि सड़क पर होने वाले हादसों का आर्धिक भार था 33,70,000 करोड़ रूपए.
हम सब को एक बात समझनी होगी कि लगभग 66% हादसे चालकों की गलती के कारण या फिर नशे की हालत में गाड़ी चलाने के कारण होते हैं. इन सब हादसों को टाला जा सकता है.
अगर हम सब यह निर्णय कर लें की हम सदा अपना वाहन सावधानी के साथ चलाएंगे तो हज़ारों लोग हादसों का शिकार होने से बच सकते हैं और देश को जो अरबों रुपये की आर्थिक क्षति झेलनी पड़ती है उसमें भी बहुत कटौती आ सकती है.   


Monday, 2 October 2017

एक रेलवे स्टेशन पर मची भगदड़

पिछले दिनों मुंबई में एक रेलवे स्टेशन पर मची भगदड़ में बाईस लोग मारे गए.
ऐसी दुखद घटनाएँ इस देश में अकसर घटती रहती हैं. कभी किसी मंदिर में दर्शन करने आये श्रदालूओं में भगदड़ मच जाती है और कभी किसी मेले या किसी राजनेता की रैली में भाग लेने आये लोगों में.
हर ऐसी घटना में बीसियों लोग मारे जाते हैं. टाइम्स ऑफ़ इंडिया में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार 2007 से 2016 के बीच देश के अलग-अलग भागों में  भगदड़ मचने की 27  घटनाएं घटीं जिनमें 968 लोगों की मृत्यु हुई. अर्थात औसतन हर वर्ष लगभग तीन घटनाएं घटीं और हर घटना में लगभग 35 लोग मारे गए.
हर बार सरकार (चाहे है वह कोई भी हो) चिंता व्यक्त करती है, जांच बैठाती है, मुआवज़े की घोषणा करती है. विपक्ष सरकार की आलोचना करता है, मंत्री के त्यागपत्र की मांग करता है. और बात वहीँ खत्म हो जाती.
इस बार भी ऐसा हुआ है. मीडिया में इस घटना को लेकर खूब चर्चा हुई है, विपक्ष ने अपना दाय्तिव निभाते हुए सरकार पार कड़े आरोप लगाएं हैं, सरकार ने मुआवज़े की घोषणा कर अपना कर्तव्य निभाया है.
पर हम सब, जो इन घटनाओं के चपेट में नहीं आते, तटस्थ से  बैठे रहते हैं क्योंकि कोई भी ऐसी दुर्घटना अब हमें झिंझोड़ती नहीं है.
हमारी इस तटस्थता का एक कारण है. अपनी और औरों की सुरक्षा को लेकर हम सब अधिक चिंतित नहीं होते, सुरक्षा को लेकर हमारी बेपरवाही विस्मयकारी ही है.
अगर आपको कभी किसी रेलवे स्टेशन पर रुकने का अवसर मिला है तो आपने लोगों को अकसर रेलवे ट्रैक पार करते हुए देखा होगा. मैंने तो कई बार लोगों को बीवी और बच्चों सहित रेल की पटरी पार करते देखा है. एक परिवार के साथ एक बूढ़ी महिला भी थी. आश्चर्य की बात नहीं कि हर दिन कई लोग रेल पटरियां पार करते हुए मारे जाते हैं.
रेलवे फाटक पर पाँच-दस मिनट रुकने के बजाये लोग अकसर फाटक के नीचे से अपने स्कूटर और बाइक निकाल ले जाते हैं. मुझे आज तक एक घटना नहीं भूलती. कई वर्ष हुए दिल्ली में शक्तिनगर के पास दो लड़के, जिन की आयु बीस के आसपास थी, अपनी बाइक फाटक के नीचे से निकाल रहे थे. उनकी बाइक रेल की पटरी पर रुक गई. जब तक वह उसे खींच कर पार ले जाते दोनों रेलगाड़ी के नीचे आ गए और कुचले गए. ऐसा हर दिन कहीं न कहीं होता ही रहता है.
हमारी अपनी सुरक्षा को लेकर लापरवाही की एक और मिसाल. जहां हमारा मन करता है वहीँ से हम सड़क पार कर लेते है. इस कारण हर दिन कई पैदल चलने वाले दुर्घटनाओं का शिकार होते हैं.
मेरा अपना अनुभव भी बहुत डराने वाला है. एक सुबह में कार से ऑफिस जा रहा था. अचानक आईएनए मार्किट के पास एक व्यक्ति रोड-डिवाइडर पर लगी रेलिंग (जो शायद चार  फुट ऊंची होगी) के ऊपर से कूद कर सीधा मेरी कार के सामने आ पहुंचा. मैंने अपनी कार कैसे रोकी यह मैं ही जानता हूँ. वह दाँत दिखाता हुआ सड़क पार निकल गया.
सड़कों पर हर दिन चार सौ से अधिक लोग सड़क दुर्घटनाओं  मारे जाते हैं. इनमें से 77% दुर्घटनाएं वाहन चालकों की गलती के कारण होती हैं. हम सब अगर सतर्कता से अपना-अपना वाहन चलायें तो हर दिन लगभग तीन सौ लोगों को  जीवनदान मिल सकता है.
पर किसे परवाह है औरों की सुरक्षा की? इस बेपरवाही के कारण सड़क दुर्घटनाओं में मरने और घायल होने वालों की संख्या में कोई कमी नहीं आ रही और न ही निकट भविष्य में आएगी.
अगर हम सब अपनी और औरों की सुरक्षा की प्रति थोडा सचेत हो जाएँ और  थोड़ा संयम का पालन करें तो कितने ही लोग काल का ग्रास बनने से बच जाएँ. और ऐसा करने में हमें कोई बोझ भी नहीं उठाना.
पर सत्य तो यह है कि इस देश में हम सब अपने जीवन का बहुत ही तुच्छ मूल्य लगाते हैं. ऐसी स्तिथि में हम कैसे अपेक्षा कर सकते हैं कि सरकारें हमारे जीवन को कोई अधिक महत्व देंगी.
हमें यह भी समझना होगा कि जिस सरकार की हम आलोचना करते हैं उसका सारा तन्त्र भी तो हम-आप ही चलाते है. कितने ऐसे कर्मचारी हैं जो पूरी निष्ठा और लग्न से अपनी जिम्मेवारी निभाते हैं. मैंने तो ऐसे लोग भी देखें हैं जिन्होंने वर्षों तक ऑफिस में कलम को हाथ नहीं लगाया. हम इस बात को कितना भी नकारें पर हम स्वयं ही मुंबई जैसी दुर्घटनाओं का कारण हैं.
जब तक हम सब दूसरों के प्रति उदासीन व तटस्थ रहेंगे ऐसी दुर्घटनाएं घटती रहेंगे.