Thursday, 21 September 2017

एक बच्चे की हत्या

कुछ दिन पहले गुरुग्राम के एक स्कूल में एक बच्चे की हत्या कर दी गई. इस कांड ने बच्चे के माता-पिता को तो आहत किया ही पर टीवी  पर दिखाये गए दृश्यों को देख कर लगा कि कई अन्य माता-पिता भी आहत हुए हैं. वह सब अपने-अपने निरीह स्कूल जाते बच्चों को लेकर चिंतित हैं, भयभीत हैं.

पर मुझे लगता है कि इन लोगों में से अधिकतर की चिंता और भय कृत्रिम है. आप को शायद मेरी बात सही न लगे पर मेरी समझ में हम सब लोग “औरों” के लेकर जितना विरक्त और तटस्थ रहते हैं उतना ही हम अपने बच्चों को लेकर भी बेफिक्र रहते हैं.

सुबह की सैर करते समय मैंने बीसियों बार देखा है कि कई पिता अपने छोटे बच्चों को मोटर-साइकिलों पर बिठा कर, बिना रेड-लाइट की चिंता किये हुए, तेज़ गति से स्कूलों को ओर जा रहे होते हैं. अकसर इन पिताओं ने हेलमेट भी नहीं पहन रखा होता. अब ऐसी स्थिती में जब कोई दुर्घटना घटती है तो जान-लेवा ही होती है. मैंने तो कई बार महिलाओं को भी, ऐसे ही बेफिक्र अंदाज़ में, अपने बच्चों को कारों व स्कूटरों पर स्कूल ले जाते हुए देखा है.
अब जब माता-पिता स्वयं ही इस तरह ट्रैफिक नियमों का उलंघ्घन करते हुए स्कूटर या कार चलाते हैं तो उन बस/टैक्सी/वैन  ड्राइवरों से, जो बच्चों को स्कूल बसों, टैक्सियों या वैनों  में स्कूल ले जाते हैं, आप किस प्रकार अपेक्षा करते हैं कि वह सब ट्रैफिक नियमों का पालन करेंगे. आप किसी भी चौराहे पर खड़े हो कर देख सकते हैं कि किस तरह यह लोग बच्चों को स्कूल ले जाते हैं या दिन में वापस ले कर आते है.

कितने ही नाबालिग बच्चे सड़कों पर निर्भीकता से स्कूटर, मोटर-साइकिल व कार चलते हुए आपको दिख जायेंगे. एक बार तो मैंने एक ऐसे व्यक्ति को देखा जो कोई दसेक साल को लड़के को स्कूटर चलाना सिखा रहा था. पिता ने हेलमेट न पहन रखा था. बेटे की तो बात ही न पूछिए.

जब हम बड़े ही ट्रैफिक नियमों को लेकर उदासीन हैं तो आप इन बच्चों से क्या उम्मीद रख सकते हैं?

देश में हर एक घंटे में इक्कीस लोग सड़क दुर्घनाओं में मारे जाते हैं. इन दुर्घटनाओं में कई बार स्कूलों से आते-जाते बच्चे भी मारे जाते हैं. एक रिपोर्ट के अनुसार 2015 में चार सौ से अधिक बच्चे स्कूल बसों को लेकर हुई सड़क दुर्घनाओं में मारे गए थे. उस वर्ष 15633 बच्चों की अलग-अलग सड़क दुर्घटनाओं में मृत्यु हुई थी. यह संख्या हत्या/शिशु-हत्या  वगेरह में मारे जाने वाले बच्चों की संख्या से सात गुणा से भी अधिक है.

पर क्या आप ने किसी माता-पिता को इस बात को लेकर चिंतित देखा है? कितने लोग हैं जो झंडे ले कर सड़कों पर उतरे हैं? कितने लोगों ने शपथ ली है कि वह हर समय ट्रैफिक नियमों का पालन करेंगे और सड़क पर अपना वाहन चलाते समय अपना ही नहीं औरों की सुरक्षा व सुविधा का पूरा ध्यान रखेंगे?

एक बच्चे की निर्मम हत्या को लेकर कुछ लोगों का रोना-धोना मुझे तो बेमानी लगता है. अगर हर दिन बयालीस से अधिक (यह संख्या 2015 की है, आज यह संख्या और भी ज़्यादा होगी) निर्दोष बच्चे सड़क दुर्घटनाओं में मर रहे हैं और हम सब बेफिक्रे, निश्चिन्त बैठे हैं तो कहीं न कहीं हमारी सोच पर प्रश्न चिन्ह लग ही जाता है.


Tuesday, 19 September 2017

क्यों पनाह दी जाए रोहिंग्या शरणार्थीयों को?
अचानक देश में कई नेताओं, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, और ह्यूमन-राइट्स वालों के मन में रोहिंग्या शरणार्थीयों के प्रति प्रेम उमड़ आया है. उन्हें लगता है कि आंतरिक सुरक्षा को लेकर सरकार की चिंता बेमानी है.
सबसे पहले यह बात समझने वाली है कि जो लोग आज रोहिंग्या शरणार्थीयों  के लिए आंसूं बहा रहे हैं उन में से अधिकतर वह लोग हैं जो साल के चार-छह महीने विदेशों में रहना पसंद करते हैं, नई दिल्ली के आलिशान  सरकारी बंगलों में या दिल्ली की पॉश कॉलोनियों में रहते हैं, पाँच-सितारा होटलों में आयोजित सम्मेलनों में भाग लेते हैं और अपने उद्गारों से देश और सरकार को अनुगृहित करते हैं. इनके घरों पर अकसर एक पट्टी लगी रहती जिस पर लिखा होता है ‘कुत्तों से सावधान’ या ‘रोब्बेर्स विल बी शॉट’ (डाकुओं को गोली मार दी जायेगी)
अगर हम मान भी लें कि आंतरिक सुरक्षा को लेकर सरकार की चिंता तथ्यों पर आधारित नहीं है या सरकार इस खतरे को अधिक ही महत्व दे रही तब भी प्रश्न तो उठता है कि क्यों हम अपने देश में इन शरणार्थीयों को बसने दें? क्या हमने देश से गरीबी, भुखमरी, जहालत, बीमारी को पूरी तरह से हटा दिया है जो अब हम संसार के अन्य पीड़ित लोगों को शरण दे, उनका भरण-पोषण करना चाहते हैं?
वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार २०१३  में भारत में गरीब लोगों के संख्या सबसे अधिक थी. संसार का हर तीसरा गरीब आदमी भारत में रहता था. लगभग अस्सी करोड़ लोग ‘इंटरनेशनल पावर्टी लाइन’ के नीचे थे और दिन में 115 रूपए से कम पर निर्वाह करते थे. भारत सरकार के मापदंडों के अनुसार कोई बाईस करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे थे.
गरीबी रेखा के नीचे यह सब लोग उतना ही जीएसटी देते हैं जितना वह लोग जो अपनी छुट्टियां विदेश में मनाने जाते हैं और रोहिंग्या शरणार्थीयों को लेकर सरकार की आलोचना करते हैं. यह श्रेष्ठजन चाहे कुछ भी कहें पर कठोर सत्य तो यही है कि सरकार का पहला कर्तव्य अपने देश के लोगों के प्रति होना चाहिए न कि उन लोगों के प्रति जो अपने-अपने देशों में वहां के लोगों के साथ घुलमिल कर रह नहीं पा रहे? गरीब जनता से वसूला टैक्स गरीबों के कल्याण के लिए ही खर्च होना चाहिए. अगर श्रेष्ठजन परोपकार करना चाहते हैं तो उन्हें स्वेच्छा से कहना चाहिए कि रोहिंग्या शरणार्थीयों पर होने वाला खर्च पूरा करने के लिए वह सब श्रेष्ठजन अधिक इनकम/ अन्य टैक्स भरने को तैयार हैं.
आंतरिक सुरक्षा की जब बात आती है तो एक बात ध्यान देने योग्य है. कुछ रोहिंग्या शरणार्थी म्यांमार से हज़ारों मील दूर जम्मू व लद्धाक में जा बसें हैं. परन्तु कोई भी रोहिंग्या शरणार्थी कश्मीर घाटी में जाकर नहीं बसा. क्या ऐसा बस यूँही हो रहा है या इसके पीछे किसी की कोई सोची समझी चाल है. मीडिया में इस बात को ज़रा भी चर्चित नहीं किया गया
यह बात भी जान लेनी चाहिए कि म्यांमार ही एक अकेला देश नहीं है जहां से लोग आंतरिक युद्ध या संघर्ष के कारण पलायन कर रहे हैं? अगर हमें ऐसे पीड़ित लोगों को अपने देश में शरण देनी है तो हमें अपने दरवाज़े उन सब लोगों के लिए खोल देने चाहिए जो अपने-अपने देशों में अत्याचार का शिकार हो रहे हैं, चाहे वह लोग सूडान में रहते हों या इराक में.
पोस्ट-स्क्रिप्ट
नई दिल्ली में जो लोग रोहिंग्या शरणार्थीयों के समर्थन में खड़े हुए हैं, उन श्रेष्ठजनों के घरों (महलों?) के आसपास गरीब लोगों का आना भी सम्भव नहीं है. न आपको वहां झुग्गी-झोपड़ियां दिखेंगी, न ही साइकिल-रिक्शा चलते या फेरी लगते गरीब लोग.


Wednesday, 26 April 2017

“अरविंद केजरीवाल जी, कृपया मतदाताओं का अपमान न करें”.
दिल्ली में सत्ता पाने के समय से ‘आप’ दल के नेताओं का जैसा व्यवहार रहा है, उसे देख कर यह अनुमान लगाया जा सकता था कि दिल्ली एमसीडी चुनावों में पार्टी की हार के लिए वह किसी न किसी को दोषी करार दे देंगे. संविधानिक संस्थाओं और परम्पराओं का सम्मान करने का चलन उनके दल में नहीं है ऐसा हम सब ने देखा ही है. वह उसी नियम-कानून के मानने को तैयार हैं जो उनकी समझ में सही है, भ्रष्टाचार की उनकी अपनी परिभाषा है. ऐसे में उनसे अपेक्षा करना कि जनता के निर्णय का सम्मान करते हुए वह इस निर्णय को विनम्रता से स्वीकार कर लेंगे गलत होगा.  
चुनाव के नतीजे आने से पहले ही ‘आप’ के नेता जैसी  बोली बोल रहे थे वह अपेक्षित ही थी. उनके किसी नेता ने कहा कि अगर उनकी पार्टी की जीत होगी तो यह जनता का निर्णय होगा पर अगर बीजेपी की जीत होती है तो यह ईवीएम् मशीनों के कारण होगी.
आज यही राग उनके नेता आलाप रहे हैं. ऐसा करके वह उन सब मतदाताओं का अपमान कर रहे हैं जिनका लोकतंत्र में पूरा विश्वास है, जिन्होंने मतदान में भाग लिया. समय-समय पर चुनाव हारे हुए नेता ऐसा राग अलापते रहे हैं. बीजेपी के नेताओं ने भी ऐसी बातें कहीं हैं. पिछले कुछ दिनों से कांग्रेस के नेता भी ऐसी बातें कहने लगें हैं, हालांकि कांग्रेस के राज में ही इन मशीनों का प्रयोग आरम्भ हुआ था.   
पर जितने भी नेताओं ने (या उनके प्रतिनिधियों ने) ईवीएम् मशीनों को लेकर प्रश्न उठायें हैं उन में से आजतक एक भी व्यक्ति कोई ऐसा प्रमाण नहीं दे पाया जिससे यह प्रमाणित हो कि ईवीएम् मशीनों के साथ छेड़छाड़ हुई थी.
और एक बात सोचने वाली है कि जनता तो जानती है कि उन्होंने किसे वोट दिए हैं. आज तक देश की किसी भाग में मतदातों ने चुनावों की सत्यता या प्रमाणिकता पर प्रश्न नहीं उठायें हैं. कहीं कोई आंदोलन नहीं हुआ, कहीं भी लोगों ने यह बात नहीं उठायी कि ईवीएम् मशीनों का गलत इस्तेमाल हुआ है. अगर ईवीएम् मशीनों को इतने बड़े पैमाने पर दुरुपयोग संभव होता तो क्या कोई सत्ताधारी पार्टी चुनाव हारती? क्या मोदी जी तीन बार गुजरात में चुनाव जीत पाते? क्या दिल्ली में सत्ता परिवर्तन होता?
आज किसी टीवी पर हो रही चर्चा में ‘आप’ के नेता कह रहे थे ‘क्या कोई मुझे “समझा” सकता है वगैरह-वगैरह’.  मुझे उसकी बात सुन हंसी आई. जब ‘आप’ ने यह तय कर ही लिया है कि ‘आप’ की हार का कारण मतदाता नहीं, ईवीएम् मशीनों हैं तो ‘आप’ को कोई क्या समझा सकता है. कहावत है कि सोये को जगाया जा सकता है, जागे को कौन जगा सकता है.
अरविंद केजरीवाल जी हम नहीं जानते कि ‘आप’ की क्या मजबूरी है जो  आप सत्य को स्वीकार नहीं कर सकते. पर चुनावों में मिली करारी हार के लिए ईवीएम् मशीनों को दोष देकर मतदाताओं का  अपमान न करें. आपका संविधान में, संस्थाओं में, लोकतंत्र में विश्वास हो न हो, देश के अधिकतर लोगों का विश्वास है, उनके विश्वास का अपमान न करें, इसी में देश और समाज की भलाई है.  


Saturday, 15 April 2017

मतदाताओं में ख़राबी है.

मुकंदी लाल जी को हम ने लाख समझाया पर इस बार उन्होंने हमारी एक न सुनी.
‘इस बार हम आपकी एक न सुनेंगे. हर बार हम अपना मन पक्का करते हैं और हर बार आप हमारा विश्वास डगमगा देते हैं. इस बार हम अवश्य ही मुनिसिपलिटी का चुनाव लड़ेंगे. कोई पार्टी हमें टिकट दे या न दे, हमारा निर्णय न बदलेगा. हम चुनाव में खड़े होंगे, चाहे निर्दलीय ही खड़े हों. आप समझ नहीं रहे, अगर आप-हम जैसे अच्छे लोग राजनीति में आयेंगे नहीं  तो राजनीति बदलेगी कैसे?’
उनकी बात सुन मन में गुदगुदी सी हुई. अनचाहे ही पर अपने साथ वह हमें भी अच्छा कह रहे थे.
‘मुकंदी लाल जी, कितने ही लोग पहले से राजनीति को बदलने में अपना सब कुछ दांव पार लगा कर बैठे हैं. अब आप भी राजनीति बदलने के अभियान में जुट जायेंगे तो राजनीति बेचारी तो पूरी तरह त्रस्त हो जायेगी. राजनीति पर इतना अत्याचार न करें. साठ वर्षों से हमारे राजनेता राजनीति की........’
‘आप जितना भी व्यंग्य करना चाहें करें पर हम अब रुकने वाले नहीं.’
और मुकंदी लाल जी नहीं रुके. किसी पार्टी से टिकट तो मिलना था नहीं, निर्दलीय के रूप में ही उन्होंने पर्चा भर दिया और चुनाव अभियान में कूद पड़े. घर-घर जाकर मतदाताओं के सामने उन्होंने अपने विचार रखे, राजनीति को बदलने का अपना निश्चय बताया. सबने सहयोग का विश्वास दिलाया.
“हमारा विश्वास करें. अभी तक सब राजनेताओं ने आपको ठगा है. हम आपको ठगने के विचार से राजनीति में नहीं आये हैं. इस देश के लिए, इस समाज के लिए कुछ करने का निश्चय किया है. इस राजनीति को बदल देंगे. चुनाव समाप्त होते ही सब राजनेता लोगों को भुला बैठते हैं. सब के सब सत्ता के पीछे दौड़ पड़ते हैं, अपने परिवार को राजनीति में लाने के प्रयास में लगे रहते हैं. हम ऐसा नहीं करेंगे. हमारे परिवार को कोई भी सदस्य हमारे आसपास भी न दिखेगा.” ऐसी ही कई बातें  मुकंदी लाल जी ने लोगों से कही.
चुनाव के बाद उन्हें पूरा विश्वास था कि वह जीत जायेंगे, ‘लोगों का उत्साह देखते ही बनता था. मुझे तो लगता है कि अन्य सभी उम्मीदवारों की ज़मानत ज़ब्त हो जाएगी. जीत पक्की है. अच्छा किया जो आपकी बातों में न आया और इस बार चुनाव में खड़ा हो ही गया. अब इस समाज को बदल कर रख दूंगा.’
यह डायलाग उन्होंने ऐसे कहा जैसे कह रहे हों, ‘पाप को जला कर राख कर दूंगा.’
चुनाव का नतीजा आया. मुकंदी लाल जी को कुल उन्नीस वोट मिले थे. जीतने वाले उम्मीदवार को चालीस हज़ार से अधिक वोट मिले थे. जो व्यक्ति दसवें स्थान पर आया था उसे एक सौ बीस मत मिले थे. मुकंदी लाल जी को सब से कम मत मिले थे.
‘क्या लगता है आपको, क्या मशीन में कोई गड़बड़ थी? आपके जानने- पहचानने वालों की संख्या ही पचास से ऊपर होगी. कम से कम पचास मत तो मिलने ही चाहिए थे?’  
‘नहीं भाई साहिब, मशीन में कोई गड़बड़ नहीं थी. मशीन में क्या खराबी होगी.  मुझे लगता है मतदाताओं में ही खराबी है, जानते हैं जो व्यक्ति चुनाव जीता है उसने पांचवीं बार पार्टी बदली है. हम नई राजनीति की बात कर रहे थे और लोग दल-बद्लूओं को वोट दे रहे थे. सुना है जितने लोग जीते हैं उन में से कईयों के विरुद्ध अपराधिक मामले भी चल रहे हैं. मशीन बेचारी क्या करे, जब मतदाता ही ऐसे लोगों को वोट दे देते हैं.’
‘पर दूसरी पार्टियों के नेता तो मशीन को ही दोष दे रहे हैं.’
‘मशीन उनकी बात का जवाब नहीं दे सकती इसलिए मशीन पर दोष लगाना सरल है. अपने को कोई दोषी मानता नहीं. एक-दूसरे को हार का दोषी ठहराएंगे तो आपस में ही कहा-सुनी हो सकती है.’
‘पर आप भी तो मतदाताओं को दोषी ठहरा रहे हैं?’
‘तो क्या गलत कर रहे हैं?’

हम चुप हो गए, मतदाता की भूमिका को नकारा तो नहीं जा सकता. आज की राजनीति के लिए क्या सिर्फ राजनेता ही दोषी हैं, यह प्रश्न हमारे समक्ष भी खड़ा हो गया.

Tuesday, 4 April 2017


आज़ादी का नारा
मुकंदी लाल जी ने हमारे अध्ययन-कक्ष में प्रवेश किया. उनकी गंभीर मुद्रा देख कर हमें समझने में देर न लगी कि श्रीमान किसी उलझन में घिरे हुए हैं.
बोले, ‘यह यादवपुर विश्वविद्यालय कहाँ है?’
‘यादवपुर या जादवपुर?’ हम ने जानबूझ कर उन्हें छेड़ते हुए कहा.
‘अरे, बाल की खाल उतारने के बजाय हमारी उलझन सुलझाने का प्रयास करें.’
‘जहां तक हमारी जानकारी है जादवपुर विश्वविद्यालय पश्चिम बंगाल में स्थित है.’
‘आप ठीक से जानते हैं या अनुमान लगा रहे हैं?’
‘ठीक से जानते हैं? आपको शंका क्यों हो रही है.’
‘उस विश्वविद्यालय के कुछ छात्रों ने आज़ादी के नारे लगाए. पर उलझन इस बात की हैं कि छात्रों ने पश्चिम बंगाल की आज़ादी के नारे नहीं लगाए, कश्मीर की आज़ादी के, मणिपुर और नगालैंड की आज़ादी के नारे लगाए. इस कारण हमें समझ नहीं आ रहा कि विश्वविद्यालय हैं कहाँ पर?’
‘अरे, इस में इतना उलझने की क्या बात है, अगर दिल्ली के विद्यार्थी कश्मीर के लिए नारे लगा सकते हैं तो यादवपुर विश्वविद्यालय के छात्र भी नारे लगा सकते हैं.’
‘ऐसा है तो चेचनिया और बलोचिस्तान की आज़ादी के नारे क्यों नहीं लगाते.’
‘अरे आप तो इस बात को बड़ी गंभीरता से ले रहे हैं. दो-चार लोगों ने नारे लगा दिए, टीवी पर चंद  मिनटों के लिए चर्चा का विषय बन गए. इन लोगों की क्रान्ति विश्वविद्यालय प्रांगण से आरम्भ हो कर किसी टीवी स्टुडियो में समाप्त हो जाती है.’
‘अरे, आप समझ नहीं रहे. हमारे साले साहिब इन लोगों से इतने प्रभावित हो गए हैं कि ज़िद पर अड़े हैं, कह रहे हैं कि वह भी किसी की आज़ादी के लिए नारे लगायेंगे. दहेज़ में मिले हैं तो हम कुछ कह भी नहीं सकते. हम ने सुझाव दिया कि इन समझदार लोगों की भांति तुम भी कश्मीर की आज़ादी के लिए दो-चार नारे लगा कर मन के ताप को ठंडा कर लो. जानते हैं क्या बोले?’
‘हम कैसे जानेगे.’
‘सही कहा आपने. हम ही बताते हैं. बोले, ‘कश्मीरी मूर्ख हैं, इनकी आज़ादी एक दिन न टिकेगी. आज़ादी मिल भी गयी तो अगले ही दिन चीन या पकिस्तान हड़प लेगा.’ श्रीमान सोच रहे हैं कि स्कॉटलैंड की आज़ादी के नारे लगायें.’
मुकंदी लाल जी की बात सुन हम चौंक पड़े. ‘उसे मालूम भी है कि स्कॉटलैंड कहाँ हैं?’
‘यही तो हम समझ नहीं पा रहे, चार साल में बारहवीं पास की और छह साल से बीए कर रहा है.  सपने देख रहा है स्कॉटलैंड की आज़ादी के.’
‘अरे भाई वह अकेला ऐसा विध्यार्थी नहीं है जिसके भीतर क्रांति के बीज पनप रहे हैं. इन्टरनेट भरा पड़ा है ऐसे क्रांतिकारियों से.’
‘पर समस्या इतनी भी सरल नहीं हैं साले साहिब की मांग है कि वह कुछ समय फ्रांस में बिताना चाहते हैं, स्कॉटलैंड की समस्या का अध्ययन करने के लिए.’
हमें मुकंदी लाल जी की स्थिति दयनीय लगी. सुझाव दिया, ‘आप भी आज़ादी का नारा क्यों नहीं लगाते.’
‘किसी की आज़ादी का नारा लगाएं?’ वह थोड़ा बिगड़ कर बोले.
‘अपनी आज़ादी का. अपने साले साहिब से आज़ादी का नारा लगाएं.’
हमारी बात उन्हें जंच गई और वह जोर से हंस दिए.


Sunday, 26 March 2017

हाउस टैक्स खत्म होगा

मुकंदी लाल जी झल्लाये हुए आये और लगभग चिल्लाते हुए बोले, ‘यह आप ने क्या किया?’
हम थोड़ा चौंके, ‘अरे इतने खफ़ा क्यों हैं? ऐसा क्या कर दिया हम ने?’
‘आप की बात कौन कर रहा है. वैसे भी आपकी क्या औकात है कि आप कुछ कर पायें. मैं तो इस आम आदमी पार्टी की बात कर रहा हूँ. अब उनके नेता कह रहे हैं कि अगर उनकी पार्टी दिल्ली एमसीडी  में  सत्ता में आई तो वह हाउस टैक्स समाप्त कर देंगे.’
‘यह तो अच्छी बात है. क्या आप को हाउस टैक्स भरना अच्छा लगता है.’
‘आप पूरी बात तो समझते नहीं, केजरीवाल जी लोगों का हाउस टैक्स का बकाया भी माफ़ कर देंगे.’
‘तो?’
‘हम मूर्ख हैं जो वर्षों से समय से पहले ही टैक्स जमा करा रहे हैं? एक बार भी टैक्स भुगतान में चूक नहीं की. अब लग रहा है कि बहुत बड़ी भूल कर बैठे. हम ने भी दो-चार साल का टैक्स बकाया रखा होता तो हमारा भी बकाया टैक्स माफ़ हो जाता.’
‘आप की बात में तर्क तो है. हम लोग अच्छे नागरिक बनने की होड़ में लगे रहे, नियमों का पालन करते रहे, पर लाभ होगा उन्हें जो सीना ठोक कर कानून की अवहेलना करते रहे.’
‘हमें तो नियमों का पालन करने की सज़ा मिल रही है.’
‘हमारे एक जानकार हैं. इनकम टैक्स वालों से उनका पाला पड़ता ही रहता है. एक दिन कह रहे थे कि अगर कोई आदमी समय पर टैक्स अदा करे, समय पर रिटर्न भरे तो इनकम टैक्स वाले हाथ धो कर उसके पीछे पड़ जाते हैं.  लेकिन जो व्यक्ति  सालों तक टैक्स जमा नहीं कराता, किसी नोटिस का जवाब नहीं देता, किसी नियम-कानून की परवाह नहीं करता  उसके सामने सरकार हाथ जोड़ कर खड़ी हो जाते है. निवेदन करती है कि भाई, बीस प्रतिशत ही टैक्स दे दो, न तुम्हें कोई पेनल्टी लगेगी, न तुम से कोई सवाल-जवाब किये जायेंगे. लगता है हमारे मित्र ठीक ही कह रहे थे.’
‘हम ने तो सोच लिया है कि अब से इंकम टैक्स भी न जमा करायेंगे. क्या पता अगले चुनाव के बाद केंद्र में ‘आप’ की सरकार बन जाए और ‘आप’ सरकार  इनकम टैक्स के बकाया को भी माफ़ कर दें.’

‘अरे ऐसा......’ हमारी बात सुने बिना ही मुकंदी लाल जी दनदनाते हुए चल दिए.

Tuesday, 14 March 2017

बीजेपी को मीडिया का आभार व्यक्त करना चाहिए?
जब हम किसी विशाल पेड़ को देखते हैं तब हमें यह समझ लेना चाहिये कि उस पेड़ का बीज वर्षों पहले किसी ने बोया होगा. किसी विशाल नदी को देख कर जान लेना चाहिए की धारा का स्रोत कहीं दूर, बहुत दूर होगा.
ऐसा ही मानव समाज में होता है. जो घटनाएं आज घट रही हैं उनके बीज वर्षों पहले ही किसी न किसी ने बोये होते हैं. जिस रूप में हम किसी को आज देखते हैं वैसा रूप वह एक दिन में नहीं पा लेता. कई लोग और  कई घटनाएं उसके जीवन की धारा को प्रभावित करती  हैं.
जिस मुकाम पर आज मोदी जी पहुंचें हैं वहां तक पहुचने के लिए उन्होंने एक लम्बी यात्रा की है. उस यात्रा में कई महत्वपूर्ण पड़ाव रहे होंगे. कई बातों ने, कई घटनाओं ने, कई लोगों ने उन्हें उत्साहित किया होगा या उन्हें चुनौती दी होगी. इन सब चुनौतियों को पार कर आज वह एक जुझारू नेता के रूप में हम सब के समक्ष हैं.
एक मायने में मोदी जी के लिए सबसे बड़ी चुनौती तो मीडिया और बुद्धजीवी वर्ग ही रहा है. यहाँ एक बात समझ लेनी होगी कि मीडिया के लिये बुद्धिजीवी वही हैं जो पूरे या आधा-अधूरे  वामपंथी हैं. अन्य बुद्धिजीवी किसी गिनती में नहीं आते.
गुजरात दंगो के बाद लगभग सारे मीडिया ने मोदी जी को  पूर्णरूप से दोषी करार दे दिया था. वर्षों तक उनके विरुद्ध लगाये गए हर आरोप को मीडिया ने जिस तरह बहस का मुद्दा बनाये रखा  ऐसा शायद ही कभी हुआ था. आज भी मीडिया और बुद्धिजीवियों के रुख में कोई खास परिवर्तन नहीं आया. अभी कल ही किसी चैनल पर कोई कह रहे थे कि मोदी जी कभी भी ‘हिन्दुस्तान’ शब्द का प्रयोग नहीं करते, अपने देश को या तो भारत कहते हैं या इंडिया.
इतनी बारीकी से किसी और नेता का बातों का विश्लेषण आपने किसी चैनल या किसी समाचार पत्र में होते हुए क्या देखा है? ऐसी कृपा सिर्फ मोदी जी पर होती है.
उत्तर प्रदेश में बीजेपी  को इतनी भारी सफलता मिली. पर क्या चुनावों के पहले या चुनावों के दौरान किसी चैनल या किसी समाचार पत्र में आपने देखा या पढ़ा कि उत्तर प्रदेश में बदलाव की लहर उठ रही है? मीडिया कि इस चुप्पी के दो ही कारण हो सकते हैं. एक, मीडिया के लोग न अधिक मेहनत करते हैं, न उनमें उतनी समझ जितने उनसे अपेक्षित है. (कई वर्ष पहले मुझे किसी ने बताया था कि जो लोग कश्मीर में हो रही घटनाओं पर रिपोर्टिंग करते है वह सब दिल्ली से श्रीनगर आ तो जाते हैं पर रेजीडेंसी रोड पर स्थित एक होटल से बाहर कभी नहीं जाते. उसी होटल में स्थापित हो घाटी में हो रही घटनाओं पर अपनी रिपोर्ट लिख देते हैं).  दो, मीडिया ने तय कर रखा है कि मोदी जी की हर उपलब्धि को जितना घटा कर बता सकते हैं उतना घटा कर ही बताएँगे.
पर इन सारी चुनौतियों ने मोदी जी को शक्तिवान ही बनाया है. जिस संकल्प से मोदी जी ने चुनावों में प्रचार किया वह अविश्वसनीय था. मीडिया चाहे कितना भी नकारे, आज परिणाम सबके सामने है. मीडिया और बुद्धिजीवी वर्ग को गलत साबित कर मोदी जी देश की राजनीति में एक नया मोड़ लाने में सफल हुए हैं.
ऐसे में  बीजेपी को मोदी जी के प्रति तो अपना आभार व्यक्त करना ही चाहिये परन्तु अच्छा होगा अगर बीजेपी के लोग मीडिया और बुद्धिजीवियों के प्रति भी अपना आभार व्यक्त करें. 


Friday, 3 March 2017

अभिव्यक्ति की आज़ादी और हम
जेएनयू से ‘आज़ादी’ की जो लहर उठ डीयू की ओर जा रही थी उस लहर से हम कैसे अछूते रहते. जो रास्ता जेएनयू से डीयू की ओर जाता है उस रास्ते पर हमारा आना-जाना लगा ही रहता है. इस कारण, धूएँ सामान, वातावरण में फैलते आज़ादी के नारों ने हमें भी उत्साहित किया.  पर अब हमारी समस्या हम स्वयं नहीं, हमारा कुत्ता है.
हमें तो परिवार के सभी सदस्यों ने साफ़ चेता दिया था, ‘अपने के इस बढ़ते प्रदूषण से बचा कर रखियेगा. इस उम्र में अभिव्यक्ति की आज़ादी के ख्वाब देखना सेहत के लिए हानिकारक हो सकता है.’
सत्य तो यह है कि जब से हम सेवा-निर्वृत्त हुए हैं तब से हम सब परिवारजनों की सुविधा का साधन हो गए हैं. हम बाथरूम जाने लगते हैं तो पत्नी कहती है, ‘इतनी जल्दी क्या है, सारा दिन घर में ही तो रहना है. अभी यूवी को बाथरूम जाना है. वह आज जल्दी ऑफिस जाएगा.’ हम अख़बार लेकर बैठते हैं तो बहु आकर कहती है, ‘आप के पास तो पूरा दिन है, अभी मुझे हेड लाइन्स देख लेने दीजिये’. हम कोई किताब खोल कर बैठते हैं तो मिंटू बोलता है, ‘पहले ज़रा यह मेरे  इनकम-टैक्स के पेपर देख लें, कितना टैक्स भरना है, कितनी बचत और करनी होगी, चेक कर के बता दें. आज ही ऑफिस में डिक्लेरेशन देनी है.’ धूप सेंकने का मन होता है तो आवाज़ आती है, ‘यूँ निठ्ठले बैठने से तो अच्छा होगा यह पुराने अख़बार ठीक से तह करके ऊपर रख दो. फिर यह किचन की चिम्मनी भी बहुत गंदी हो रही है और बाथरूम का.........’
बस ऐसे ही ‘मज़े’ में दिन कट रहे थे की ‘आज़ादी’ की लहर हमें छू कर आगे डीयू की ओर चल दी. पर इससे पहले कि मन में किसी तरह की कोई उमंग उठती और हम कोई नारा लगाते, हमें सावधान कर दिया गया.
हम तो समझ गए पर हमारा कुत्ता न समझा. वैसे हमारा कुत्ता भी हम पर ही अपना रौब दिखाता है. वह दबंग कुत्तों को देख कर हमारी टांगो में छिप जाता है पर नन्हें बच्चों, बुज़ुर्ग महिलाओं और मरियल कुत्तों को देख कर अपने आत्मविश्वास का पूरा प्रदर्शन करता है. इस कारण कई बार हमें अड़ोसियों-पड़ोसियों से उलटी-सीधी बातें सुननी पड़ती हैं.
हमारे कुत्ते ने भी जाना कि अभिव्यक्ति की आज़ादी का जीवन में बहुत महत्व है. टीवी डिबेट्स देखने का जितना चस्का हमें है उससे अधिक हमारे कुत्ते को है.  जितना हम अ गोस्वामी की कमी महसूस कर रहे हैं उतनी कमी वह (अ गोस्वामी नहीं, हमारा कुत्ता) भी महसूस कर रहा है. टीवी पर चलती अनंत चर्चाओं को देख और सुन उसने भी आज़ादी के ख्वाब  देखने शुरू कर दिए हैं.
उसे भी अभिव्यक्ति की आज़ादी चाहिए है, ऐसा उसने अपने व्यवहार से स्पष्ट कर दिया है. वह दबंग कुत्तों और नौजवान युवकों और युवतियों पर दिल खोल कर भौंकना चाहता है. पर यह कार्य वह हमारी देख-रेख और हमारे संरक्षण में ही करना चाहता है. 

अवसर मिलते ही हमारी टांगों की आढ़ लेकर एक दिन वह एक जर्मन शेफर्ड पर बुलंद आवाज़ से भौंकने लगा.
जर्मन शेफर्ड हमारे कुत्ते की इस बेअदबी पर इतना नाराज़ हुआ की पलक झपकते ही हम पर टूट पड़ा. हम ऐसे भागे जैसे कभी मिल्खा सिंह भी न भागे होंगे और  जैसे-तैसे कर हम जान बचा कर घर पहुंचे.
पर हमारे कुत्ते को तो ऐसा लगा कि जैसे उसने एवेरस्ट पर विजय पा ली है. अपनी अभिव्यक्ति की आज़ादी का भरपूर आनंद उठाने का उसने पक्का निर्णय कर लिया है. समस्या हमारी है. पहले सिर्फ लोगों की बातें सुननी  पड़ती थीं, अब दबंग कुत्तों से बच कर रहना पड़ता है.    

Thursday, 2 March 2017

यह गुरमेहर कौन है?
मुकंदीलाल जी ने हमारे सामने आज का समाचार पत्र फैंकते हुए पुछा, ‘यह गुरमेहर कौन है?
हम ने समाचार पत्र के ऊपर एक फिसलती हुई नज़र डाली. मोटे-मोटे अक्षरों में छपा था, ‘गुरमेहर का कमाल, दिल्ली में बवाल.’
हम ने सर खुजलाते हुए कहा, ‘भई, बात ऐसी है कि मैं समाचार पत्र लेता अवश्य हूँ, और एक नहीं तीन-तीन. पर पढ़ता एक भी नहीं हूँ. कोई भी समाचार पत्र अच्छे से छानबीन करके समाचार छापता नहीं, और अगर कोई छानबीन करता भी है तो छानबीन करने से पहले ही तय कर लेता है कि छानबीन का निष्कर्ष क्या होगा.’
‘क्या आप टीवी भी नहीं देखते? हर न्यूज़ चैनल पर इस लड़की की चर्चा हो रही है.’
‘अब मेरी बात सुन आपको हंसी आयेगी पर सत्य तो यही है कि मैं टीवी न्यूज़ चैनलों को मनोरंजन का साधन ही मानता हूँ.’
‘अच्छा यह बताइये कि टू-मिनट फेम क्या होती है?’ सदा की भांति मुकंदीलाल जी ने एक नया प्रश्न दाग दिया.
‘अरे मुकंदीलाल जी आप भी किस उलझन में फंस रहे हैं. यह टू-मिनट फेम टीवी वालों का आविष्कार है. टीवी किसी को भी चंद मिनटों के लिए हीरो बना देता है. चंद मिनट बीत जाने पर न कोई उस हीरो को पूछता है न ही उस मुद्दे को जिस के कारण उस व्यक्ति को हीरो बनाया जाता है.’
‘भाई साहब, मन तो हमारा भी करता है कि हमारा भी नाम हो, चाहे चंद मिनटों के लिए हो. ईमानदारी के साथ तीस-पैंतीस साल कलम घिसते रहे. दफ्तर से एक पेंसिल भी उठा कर कभी घर नहीं लाये. पर हुआ क्या? दो प्रमोशन भी नहीं मिले. जिस आदमी ने लाखों रुपयों का घपला किया था उसे चार प्रमोशन मिले, उसका नाम तो पदमश्री के लिए भी भेजा गया था.’
‘इसमें आश्चर्य की क्या बात है?’
‘भई, आप कोई सुझाव दें, हम भी चंद मिनटों के हीरो बनना चाहते हैं’
‘विलेन भी बन सकते हैं.’
‘आप कोई तरीका सुझायें, बस.’
‘किसी नेता पर जूता फैंक दें,’
‘नहीं, ऐसा नहीं कर सकते. ऐसे संस्कार माता-पिता से नहीं मिले.’
‘किसी नेता के कुत्ते को काट खाएं.’
‘इतना साहस नहीं है.’
‘कोई अवार्ड वापस कर दें.’
‘अवार्ड कभी मिला ही नहीं तो वापस क्या करें.’
‘चारों ओर फैलती असहिष्णुता को लेकर को ब्यान दें’
‘पर हमारी समझ में आम आदमी आज भी उतना ही सहिष्णु है जितना कल था. असहिष्णुता तो राजनेताओं में बढ़ीं है देश में नहीं.’
‘कश्मीर की समस्या पर कोई ब्यान दें.’
‘हमें कश्मीर समस्या का कोई ज्ञान नहीं.’
‘जो लोग ब्यान देते हैं उन्हें कौन सा ज्ञान होता है. चलिये इस गुरमेहर के पक्ष में ही ब्यान दे दें.’
‘पर यह गुरमेहर कौन है? यही तो आपसे पूछने आये थे.’

हमने अपने हाथ  खड़े कर दिए. हम सच में नहीं जानते कि यह गुरमेहर कौन है.

Tuesday, 24 January 2017

सड़क दुर्घटनाएं और हम
सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2015 में लगभग 150000 लोगों की अलग-अलग सड़क दुर्घटनाओं में मृत्यु हुई. दस वर्ष पहले, 2005 में, 94000 लोगों की सड़क दुर्घटनाओं में मृत्यु हुई थी.
यह आंकडें चौंकाने वालें हैं. पर अपने चारों ओर देख कर ऐसा लगता नहीं है कि किसी को ज़रा सी भी चिंता या घबराहट हुई है. 
हर दिन चार सौ लोगों का सड़क हादसों में मर जाना किसी भी सभ्य देश में एक अति गंभीर समस्या मानी जाती और इस समस्या को लेकर सभी विचार-विमर्श कर रहे होते.
लेकिन इस देश में तो यह बात चर्चा का विषय भी नहीं है. और लगता नहीं है की निकट भविष्य में स्थिति में कोई सुधार होगा. सबसे डराने वाली बात यह है कि आम नागरिक भी सड़क पर अपनी-अपनी गाड़ियां  चलाते समय अपनी और अपने प्रियजनों की सुरक्षा को कोई ख़ास महत्व देते हैं.
सुबह की सैर करते समय मैंने कई बार लोगों को लाल-बत्ती की अवहेलना करते देखा है, उलटी दिशा से गाड़ियों को चलते देखा है, स्कूल बसों और वैनों को अति तेज़ गति से चलते देखा है.
सबसे डराने वाला दृश्य तो तब होता है जब अपने स्कूटर या बाइक पर एक या दो (और कभी-कभी तो तीन) बच्चों को बिठा कर एक पिता धड़ल्ले से, लाल-बत्ती की परवाह किये बिना, अपनी गाड़ी को सड़क पर, कभी सही और कभी गलत दिशा में, दौड़ाता है.  
ऐसा दृश्य मैंने एक बार नहीं, बीसियों बार देखा है. और आश्चर्य तो तब होता है जब महिलाओं को भी, बच्चों को साथ लिए, ऐसे ही लापरवाह अंदाज़ में कार या स्कूटर चलाते देखता हूँ. समझ में नहीं पाता कि यह लोग अपने बच्चों के जीवन के साथ ऐसा खिलवाड़ कैसे कर लेते हैं.
ऐसे माता-पिता अपने बच्चों को क्या संस्कार दे रहे हैं, यह भी सोचने की बात है. ऐसे ही लोगों के बच्चे अकसर सड़कों पर अपनी गाड़ियां सडकों पर लापरवाही से चलाते हैं और आये दिन किसी न किसी को दुर्घटना में आहत कर देते हैं या मार डालते हैं.
दुर्घटनाएं तो चौबीसों घंटे घटती रहती हैं पर मैंने सुबह के समय की बात इसलिये की क्योंकि सुबह के समय हज़ारों माता-पिता और लाखों बच्चे घरों से स्कूल जाने के लिए निकलते हैं और एक सभ्य समाज से अपेक्षा की जा सकती है कि उस समय लोग कम से कम बच्चों की सुरक्षा को लेकर सचेत होंगे. 

गाड़ियों की संख्या हर दिन बढ़ती जा रही है. गाड़ियां चलाने के शिष्टाचार को हम हर दिन भूलते जा रहे है, नियम कानून के प्रति हमारा सम्मान हर दिन घटता जा रहा है. अगर इस वर्ष सड़क पर मरने वालों की संख्या दो लाख तक भी पहुँच जाती है तो मुझे कोई आश्चर्य न होगा.