Friday, 29 April 2016

ओड और इवन
पर्यावरण में बढ़ते प्रदूषण को लेकर दिल्ली सरकार जितनी चिंतित है वह देख कर मन बहुत उत्साहित है. कोई तो है जिस ने इस समस्या से निपटने का मन बनाया है. परन्तु क्या ओड और इवन लागू कर, सड़कों पर चलती गाड़ियों की संख्या कम कर देने से ही सरकार अपने दायित्व से मुक्त हो जाती है.
देखा जाए तो दिल्ली सरकार ने एक ऐसा सीधा और सरल कदम उठाने का निर्णय लिया है जिसे लागू करने में उस के लिए सिर्फ  मीडिया को मैनेज करना ही आवयश्क है. इसके अतिरिक्त सरकार को कोई भी कष्ट नहीं उठाना. जो भी कष्ट झेलना है वह उस आम आदमी ने झेलना है जिसने इस सरकार को इतने बड़े बहुमत से जीता कर सत्ता में भेजा.
कई जगह सड़कों का डिज़ाइन बहुत खराब है जिस कारण वहां लगभग सारा दिन गाड़ियों का जाम लगा रहता है, हर गाड़ी धीरे-धीरे, पहले या दूसरे गियर में, आगे खिसकती है, हज़ारों/लाखों  रूपए का पेट्रोल हर दिन व्यर्थ जलता है, प्रदूषण बढ़ता है, एक उदाहरण है  दाबड़ी मोड़,  लम्बे समय से यहाँ हर दिन जाम लगता है पर कोई कुछ कर नहीं पा रहा. ऐसे कई उदाहरण और भी हैं जहां हर दिन दिल्ली वालों को अपना समय और पैसा गवाना पड़ता है. प्रदूषण बढ़ता है वह अलग. 
नई दिल्ली के सेंट्रल विस्टा को छोड़ दें तो बाकी सब जगह सड़कों की हालत वर्ष में कुछ माह ही ठीक होती है. पैसा हर वर्ष खर्च होता है पर काम कैसा होता है वह सरकार भी जानती है. खराब सड़कों के कारण जो जाम लगता है और प्रदूषण बढ़ता है उसको लेकर सरकार की सोच क्या है?
ट्रैफिक लाइट्स को लेकर सरकार कितनी सतर्क है, यह भी एक प्रश्न है. पिछले सप्ताह मुझे एक रात  माता चन्नन देवी अस्पताल जाना था. एक ट्रैफिक लाइट बंद थी. एक किलोमीटर का सफर जो तीन-चार मिनट में पूरा होना था, चालीस मिनट में पूरा हुआ. अर्थात आठ-दस  गुणा से भी अधिक प्रदूषण हुआ होगा उन सब गाड़ियों के कारण जो उस जाम में फंसीं थीं. ऐसी समस्या आये दिन किसी न किसी चौराहे पर खड़ी हो ही जाती है.
जो लोग ट्रैफिक नियमों का पालन नहीं करते वह दूसरों के लिए एक आफत का कारण तो होते ही हैं, उनके कारण कई बार रास्ते में  जाम भी लग जाता है.
रास्तों पर कई जगह अतिक्रमण हो रखा है, धार्मिक स्थल बने है, आये दिन सड़कों पर जुलूस निकलते हैं, रास्तों के किनारे बाज़ार लगते है, वी आई पी वगैरह के आने-जाने के लिए रास्ते बंद किये जाते हैं, ऎसी कितनी ही स्थितियां हैं जिनके चलते सड़कों पर जाम लगते हैं और प्रदूषण बढ़ता है.  पर इन समस्याओं  से निपटने के लिए सरकार को कठोर कदम उठाने पड़ सकते हैं, अपराधियों के खिलाफ कार्यवाही करनी पड़ सकती है. रिश्वतख़ोरों को निपटना पड़ सकता है. यह सब सिर्फ नारे बाज़ी या सस्ती लोकप्रियता से नहीं होता,
पब्लिक ट्रांसपोर्ट हर समय हर जगह उपलब्ध नहीं होती. उस पर इनके चालकों का व्यवहार. आजकल तो डी टी सी ड्राईवर भी ब्लू/रेड लाइन के ड्राईवरों को पीछे छोड़ चुके हैं, इन लोगों की निरंकुशता भी एक कारण हैं कि एक ओर लोग अपने वाहन पर जाना पसंद करते हैं दूसरी ओर सडकों पर जाम लगते हैं.
इतनी समस्याओं से निपटना सरल नहीं है, सरल है ओड और इवन, बस एक आदेश जारी करना कि लोग घरों से बाहर न निकलें. अगर निकलने का साहस करें तो परिणाम भोगने को तैयार रहें.

ऐसा माना जाता है कि आग की दुर्घटनाओं से बचने के लिए अल्फ्रेड दि ग्रेट ने कर्फ्यू लगाना शुरू किया था. यह एक सरल उपाए था, जो आगे चल कर कानून –व्यवस्था बनाये रखने का उपकरण बना. आज दिल्ली सरकार ने भी एक वैसा ही सरल उपाए ढूंढॅ लिया है, और अपनी इस सफलता के लिए अपनी पीठ ठोंक रही है.

2 comments:

  1. Couldn't agree more. Simple quick fix solution and tokenism won't help anyone. Disappointed that Kejriwal has given in to popularism so soon.

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