Tuesday, 4 April 2017


आज़ादी का नारा
मुकंदी लाल जी ने हमारे अध्ययन-कक्ष में प्रवेश किया. उनकी गंभीर मुद्रा देख कर हमें समझने में देर न लगी कि श्रीमान किसी उलझन में घिरे हुए हैं.
बोले, ‘यह यादवपुर विश्वविद्यालय कहाँ है?’
‘यादवपुर या जादवपुर?’ हम ने जानबूझ कर उन्हें छेड़ते हुए कहा.
‘अरे, बाल की खाल उतारने के बजाय हमारी उलझन सुलझाने का प्रयास करें.’
‘जहां तक हमारी जानकारी है जादवपुर विश्वविद्यालय पश्चिम बंगाल में स्थित है.’
‘आप ठीक से जानते हैं या अनुमान लगा रहे हैं?’
‘ठीक से जानते हैं? आपको शंका क्यों हो रही है.’
‘उस विश्वविद्यालय के कुछ छात्रों ने आज़ादी के नारे लगाए. पर उलझन इस बात की हैं कि छात्रों ने पश्चिम बंगाल की आज़ादी के नारे नहीं लगाए, कश्मीर की आज़ादी के, मणिपुर और नगालैंड की आज़ादी के नारे लगाए. इस कारण हमें समझ नहीं आ रहा कि विश्वविद्यालय हैं कहाँ पर?’
‘अरे, इस में इतना उलझने की क्या बात है, अगर दिल्ली के विद्यार्थी कश्मीर के लिए नारे लगा सकते हैं तो यादवपुर विश्वविद्यालय के छात्र भी नारे लगा सकते हैं.’
‘ऐसा है तो चेचनिया और बलोचिस्तान की आज़ादी के नारे क्यों नहीं लगाते.’
‘अरे आप तो इस बात को बड़ी गंभीरता से ले रहे हैं. दो-चार लोगों ने नारे लगा दिए, टीवी पर चंद  मिनटों के लिए चर्चा का विषय बन गए. इन लोगों की क्रान्ति विश्वविद्यालय प्रांगण से आरम्भ हो कर किसी टीवी स्टुडियो में समाप्त हो जाती है.’
‘अरे, आप समझ नहीं रहे. हमारे साले साहिब इन लोगों से इतने प्रभावित हो गए हैं कि ज़िद पर अड़े हैं, कह रहे हैं कि वह भी किसी की आज़ादी के लिए नारे लगायेंगे. दहेज़ में मिले हैं तो हम कुछ कह भी नहीं सकते. हम ने सुझाव दिया कि इन समझदार लोगों की भांति तुम भी कश्मीर की आज़ादी के लिए दो-चार नारे लगा कर मन के ताप को ठंडा कर लो. जानते हैं क्या बोले?’
‘हम कैसे जानेगे.’
‘सही कहा आपने. हम ही बताते हैं. बोले, ‘कश्मीरी मूर्ख हैं, इनकी आज़ादी एक दिन न टिकेगी. आज़ादी मिल भी गयी तो अगले ही दिन चीन या पकिस्तान हड़प लेगा.’ श्रीमान सोच रहे हैं कि स्कॉटलैंड की आज़ादी के नारे लगायें.’
मुकंदी लाल जी की बात सुन हम चौंक पड़े. ‘उसे मालूम भी है कि स्कॉटलैंड कहाँ हैं?’
‘यही तो हम समझ नहीं पा रहे, चार साल में बारहवीं पास की और छह साल से बीए कर रहा है.  सपने देख रहा है स्कॉटलैंड की आज़ादी के.’
‘अरे भाई वह अकेला ऐसा विध्यार्थी नहीं है जिसके भीतर क्रांति के बीज पनप रहे हैं. इन्टरनेट भरा पड़ा है ऐसे क्रांतिकारियों से.’
‘पर समस्या इतनी भी सरल नहीं हैं साले साहिब की मांग है कि वह कुछ समय फ्रांस में बिताना चाहते हैं, स्कॉटलैंड की समस्या का अध्ययन करने के लिए.’
हमें मुकंदी लाल जी की स्थिति दयनीय लगी. सुझाव दिया, ‘आप भी आज़ादी का नारा क्यों नहीं लगाते.’
‘किसी की आज़ादी का नारा लगाएं?’ वह थोड़ा बिगड़ कर बोले.
‘अपनी आज़ादी का. अपने साले साहिब से आज़ादी का नारा लगाएं.’
हमारी बात उन्हें जंच गई और वह जोर से हंस दिए.


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